Blogger templates

गुरुवार, 31 मई 2012

हािर-जीत


हािर-जीत

चािरमे िदन दुनू Ćाणी सोमन िवचारलक जे आब एिह गाममे जीयब किठन अिछ तँ
गामसँ चिलये जाएब नीक हएत। दुिनयँ बड़ी टा छैक। जतए जीबैक जोगार लागत
ततए रहब। सामान सभ बािĠह, करेजपर पाथर रािख गामसँ जेबाक लेल दुनू Ćाणी
तैयार भऽ गेल। भुखल पेट ! सुखाएल मुँह !  िनराश मन ! ओसारपर बैसल दुनू
Ćाणीक आँिखसँ दहो-बहो नोर टघरैत रहै ! दुिनयँ अĠहार देिख, उठैक साहसे निह
होइत छलै। सोमनक मनमे होइत जे की छलहुँ आइ की भऽ गेलहुँ?  रगं -िबरगकं
िवचार, पािनक बुलबुला जेकँ दुनूक मनमे उठैत आ िवलीन भऽ जाइत ! आगूमे मोटरी
राखल रहै। जिहना सीमा परहक िसपाही छातीमे गोली लगलासँ घाइल भऽ जमीनपर
खिस छटपटाइत,  तिहना दुनू Ćाणी सोमन दुखक अथाह समुƖमे डुबैत-उगैत।
िभनसरसँ बारह बिज गेलैक।
सहरसा िजलाक गाम मे रचा। पूबसँ कोशी आिब गामक कटिनया करए लागल।
गर लगा-लगा गामक लोक जहँ-तहँ पड़ाए लगलाह। ओना सरकार पुबिरया बाĠहक
बाहर पुनवŭसक ĭयवİथा सेहो करैत रहए मुदा ओिहसँ बोिनहारकँ की सुख हएत?
ओकरा सबहक तँ रोजगारो िछना गेल।
पėी,  बेटा-पुतोहुक सगं फुलचनो पिडत ं गाम छोिड़ पिछम मुँहे िबदा भेलाह।
घरारी छोिड़ अपना एĸो बीत जमीन-जाएदाद निह छलिन। मुदा अपन ĭयवसाएक सभ
लूिर छलिन तँ मनमे िचĠतो ओतेक निह रहिन। िचĠता माÿ रहिन ठौर भेटबाक।
कखनो-कखनो मनमे होइन जे अपन गाम तँ बुझल-  गमल अिछ, आन गाम केहन
होएत केहन निह? मुदा उपाइये की? जीबैक लेल तँ मनुįय सभ िकछु करैत अिछ।
पछबिरया बाĠहसँ मील भिर पाछुये रहिथ आिक बाĠहपर नजिर पड़लिन। बाĠह
देिखतिह आशा जगलिन। िकएक तँ ओइ बाĠहक पिछम कोनो धार-धुर निह अिछ।
मुİकुराइत फुलचन पėीसँ पुछलक- ‘‘भगवान रामक िखİसा बुझल अिछ?’’
फुलचनक मुँह िदिश देिख मुिनया बजलीह- ‘‘बहुत िदन पिहने सुनने छेलॱ, आब
ओते िधयान नै अए।’’
‘‘जिहना अपना सभ गाम छोिड़ कऽ जा रहल छी तिहना ओहो सभ गेल रहिथ।
अपना सभकँ तँ बटखरचो अिछ, हुनका सभकँ तँ सेहो नै रहिन।’’
तिह बीच फुलचनक पुतोहु कपली सासुक बँिह पकिड़ पाछु मुँहे घुमा कहलक-
‘‘ऐँड़ीकँ डोका कािट देलक। खुन बहैए। कनी कतौ बैसथु जे लþा बािĠह देबै।’’
ऐँड़ी देिख मुिनया कहलिखन- ‘‘किनयँ,  कतौ गाछो ने देखै िछऐ जे कनी
सुİताइयो लैतॱ। हमरो िपयासे कंठ सुखैए।’’ 52 जगदीश Ćसाद मěडल
सासु-पुतोहुक बात सुिन फुलचन बाजल- ‘‘किनयँ,  जािनये कऽ तँ दैवक डँग
लागल अिछ, तखन तँ कहुना कऽ बाĠह धिर चलू। एक तँ रौदाइल छी तइपर सँ
जþे काल अँटकब तते रौदो बेिसये लागत।’’
बाĠहपर पहुँचतिह सभ िनसँस छोड़लिन। बाĠहक पिछमसँ एकटा आमक गाछ
रहै। छाहिर देिख सभ केओ गाछ तर पहुँचए गेलाह। एकटा बटोही पिहनिहसँ तौनी
िबछा पड़ल छल। कने काल सुİतेलाक बाद बटोहीकँ फुलचन पुछलिखन- ‘‘भाय,
तमाकू खाइ छह?’’
जेबीसँ चुनौटी िनकािल फुलचनक आगूमे फेकैत ओ बटोही बाजल- ‘‘कोन गाम
जेबह?’’
कोन गामक नाओ सुिनतिह फुलचनक हृदए िसहिर गेलिन। िमरिमरा कऽ
कहलिखन- ‘‘भाय,  कोन गाम जाएब तेकर तँ ठेकान निह अिछ। मुदा मेरचासँ
एलॱहँ। धारमे गाम किट रहल अिछ। तँ गाम छोिड़ जा रहल छी। जइ गाममे
कुĦहार निञ हएत तइ गाममे बिस जाएब।’’
कुĦहारक नाओ सुिनतिह बटोही उिठ कऽ बैसैत कहलिखन- ‘‘हमरो गाममे कुĦहार
नै अिछ। चलह, हमरे गाममे रिह जइहह।’’
आशा देिख सोमन पुछलकिन- ‘‘ऐठामसँ कþे दूर अहँक गाम अिछ?’’
‘‘अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहीिनये अइठीनसँ अबै छी। गामे जाएब।’’
बेर झुकैत पँचो गोटे िबदा भेलाह। लछमीपुर पहुँचतिह बटोही रतीलाल
फुलचनकँ कहलक- ‘‘भाइ, यएह हमर गाम छी।’’
गाछी बँसबािड़ देिख फुलचन पिडत ं मने-मन खुश! मने मन आकलन कएलिन जे
जारनक अभाव किहयो निह हएत। गाममे Ćवेश किरतिह बीघा दुइयेक पोखिर देख
फुलचन मने-मन तँइ कएलिन जे निह कतहुँ रहैक ठौर भेटत तँ पोखिरक महार तँ
अिछ। पोखिरक बगलेमे सभ ्यो ुिक जाइ गेलाह। रþीलाल आगू बिढ़ गेलाह।
जिहना गाममे नट-िक्चककँ अिबतिह िधया-पूता देखए अबैत तिहना फुलचनो
सभ तुरकँ देखए गामक िधया-पूता आबए लागल। गाममे कुĦहार अएबाक समाचार
पसरल। थोड़े कालक बाद फुलचन पिडत ं बेटा सोमनकँ हाथ पकिड़ कहलिखन-
‘‘बौआ, तूँ सभ एतै बैसह। हम कने गामक बाबू-भैया सभसँ भँट केने अबै छी।’’
किह फुलचन गाम िदिश िबदा भेलाह। इजोिरया पख रहै तँ सूयŭİत भेलोपर िदने
जेकँ लगै। जाधिर फुलचन घुिर कऽ अएबो निह कएलाह तिहसँ पिहनिह गामक
पनरह-बीस टा नवयुवक पहुँच गेल। सबहक मनमे नव उĜसाह रहै। िकएक तँ एखन
धिर जे अभाव कुĦहारक गाममे रहल ओ पूित् भऽ रहल अिछ। जिहना आवĮयकताक
वİतु पूित् भेलासँ िकनको मनमे खुशी होइ छै,  तिहना फुलचनक अएलासँ गामक
लोकक मनमे खुशी रहै। पोखिरसँ थोड़े हिट कŇा तीिनयेक परती छलै। सभ युवक
िवचारलक जे ओिह परतीपर बसाओल जाए। ताधिर गाम घुिर कऽ फुलचनो अएलाह।
फुलचन दुनू बापुत परती देखलिन। परती देिख सोमन िपता िदिश घुिम बाजल-
‘‘कुĦहारक बसै जोकर परती अिछ, माÿ िपऐबला पािनक िदĸत अिछ।’’ गामक िजनगी 53
तइपर िपता फुलचन पिडत ं जबाव देलिन- ‘‘एखन ने पािनक िदĸत अिछ मुदा
जखन अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूिर अिछ तखन िदĸत िकए रहत?’’
घरारी पसĠद होइतिह हो-हा करै त युवक सभ बँस काटए िबदा भेलाह। जे
जेहन बँसबला, ितनकामे तिह िहसाबसँ बँस कािट प्चीसटा बँस जमा केलिन। इहो
दुनू बापुत सगं दैत रहिथन। हाथे-पाथे सभ घरक काजमे जुिट गे लाह। राितक बारह
बजैत-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भऽ गेलैक।
Ćात भेने दुनू बापूत िवचारलिन जे एक तँ नव गाम, तहूमे नव बँस। काज तँ
बहुत अिछ। तँ काजकँ सोझरा कऽ चलए परत। रहै जोकर घर भलेहॴ निह भेल
मुदा िदन कटै जोकर तँ भइये गेल। घर-आगनं बनबैसँ लऽ कऽ कारोबार धिरक
काजमे हाथ लगबए पड़त। फुलचन सोमनसँ पुछलिखन- ‘‘बौआ, मेरचासँ कोन-कोन
समान अनने छह?’’
सोमन कहलक- ‘‘बाबू,  सोचलहुँ जे आन गाममे लगले सभ कुछ थोड़े भऽ
जाएत। तँ चाक बनबैक िशला, त्ता, फŇा, जौर, बेलक कील सभ िकछु अनने
छी।’’
खुशीसँ गद-गद होइत फुलचनक मुँहसँ िनकलल- ‘‘बाह-बाह। चाकक ओिरयान तँ
भइये गेलह। आरो की सभ अनने छह?’’
‘‘चकैठ, हथमैन, िपटना, पीरहुर, मजनी, छžा सेहो अनने छी।’’
मुİकुराइत फुलचन बाजल- ‘‘काजक तँ सभ िकछु अिछए। आइए चाको बनबैमे
हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरिड़ अिनहह। एक गोरे घरक लेिबया-मुिनयामे
हाथ लगा दहक। हमरा तँ समचे सभ ओिड़अबैमे समए बीित जे तह।’’
दस िदनक मेहनितसँ रहै जोकर एकटा घर बिन गेलै। चाको सुखा गेल।
जारनोक ओिरयान भऽ गेलैक। चाक गािर,  मािट बना सोमन चाक लग बैसल।
जिहना उńोगपितकँ नव कारखानाक उľघाटन िदन मनमे खुशी रहै छै, आइ तिहना
सभ Ćाणी फुलचनोकँ रहिन। हँसैत फुलचन पिडत ं बेटा िदिश देखैत बजलाह- ‘‘बौआ,
जते सामान बनबैक लूिर अिछ, सभ सामान बना, पका कऽ खिरहानमे पसािर, सौँसे
गौवँकँ हकार दऽ देखा देबिन। िजनगीक परीषा छी।’’
आबा उघािर चाु गोटे खल लगा-लगा सभ वİतु- कूड़, हाथी, ढकना, कोिशया,
दीप, पाěडव, गणेश, लŞमी, मटकूर, छँछी, डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अिहबात,
कोहा, फु्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पाितल, तौला, मलसी, बसनी,
उžैसमासी,  कोही,  लाबिन,  कलश,  कराही,  रोिटपĸा,  अथरा,  कसतारा,  ल्जोरी,
िधया-पूता खेलैक जँत,  नािद,  लोइट,  मँट,  टारा,  टारी,  बधना इĜयािद चािर-चािर
खल पाविनक, िबआहक, उपनयनक, āाŀक, पोखिरक यञ-कीत्नक आ घरैलू काजक
वİतु सभ अलग-अलग सजा कऽ राखल। फुलचन दुनू बापूत जा गौवँकँ देखैक
हकार देलिन।
चाु Ćाणी फुलचनकँ अपना लू िरक ठेकान निह छलिĠह िकऐक तँ सभ काजक
लेल एकबेर सभ समान किहयो निह बनौने छलाह। मुदा आइ सभटा बना सभकँ ई54 जगदीश Ćसाद मěडल
िवĂास भऽ गेलिन जे जिहना बड़का ĭयापािरक दोकानमे अनेको िकİमक सौदा रहै छै
तिहना तँ हमरो अिछ!
समए बीतैत गेल। अिधक बएस भेने दुनू Ćाणी फुलचन शरीरसँ कमजोर हुअए
लगलाह। सोमनोकँ एकटा बेटा, एकटा बेटी भेलै। पिरवार बढ़लै। खरचो बढ़लै।
समए आगू मुँहे ससरैत गेल। दुनू Ćाणी फुलचन मिर गेलाह। ....बेटीक िबयाह
सेहो सोमन कऽ लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुगŭपूजा देखए मािÿक गेल। ओतिहसँ
बौर गेल। मािटक बरतनक जगह Ɩĭयक बत्न सभ पिरवारमे धीरे-धीरे बढ़ए लगलै।
जिहसँ मािटक बत्नक मंग कमए लगल। घटैत-घटैत मािटक बरतन पिरवार छोिड़
देलक। रिह गेल माÿ पाविन, उपनयन, िबआह आ āाŀ।
अपन घटैत कारोबार आ टूटैत पिरवारसँ दुनू Ćाणी सोमन िचिĠतत होअए
लागल। आगूक िजनगी अĠहार लागए लगलै। कोनो रİते निह देखाइ। सोचैत-
िबचारैत सोमनक नजिर एकटा काजपर पड़लै। खपड़ा बनौनाइ। खपड़ापर नजिर
पहुँचतिह मुİकुराइत सोमन पėीकँ कहलक- ‘‘एकटा बड़ सुĠदर काज अिछ। कमाइयो
नीक आ काजो मािटयेक।’’
अकचकाइत पėी कपली पुछलकिन- ‘‘कोन काज?’’
सोमन- ‘‘खपड़ा बनौनाइ।’’
कने काल गुम रिह कपली बाजिल- ‘‘थोपुआ खपड़ा तँ हमहूँ बना सकै छी मुदा
निड़या नै हएत।’’
जोर दैत सोमन बाजल- ‘‘हँ, हएत ! चाक परक भलेहॴ निञ हूअए मगर मुगरी ं
परक िकअए ने हएत।’’
‘‘हँ, से तँ हएत।’’
दुनू Ćाणी खपड़ा बनबए लगल। लोककँ बुझल निह रहै तँ अगुुरबार ्यो खोज
निह केलक। मुदा जखन एकटा भŇा लगौलिन तखन गामक लोक देखलिखन।
खपड़ो नीक, पाको बिढ़यँ। िगनितयेक िहसाबसँ खपड़ा बेचए लगल। बिढ़या आमदनी
हुअए लगलिन।
बिढ़या कारोबार चलल। मुदा िसमिटक एİबेİटस अिबतिह खपड़ाक मंग कमए
लगल। खपड़ा बनौिनहारकँ मदी ं आिब गेलिन। ओना सोमनक पिरवारो छोट रहै।
माÿ दुइये गोटे पिरवारमे रहै। मु दा तैयो गुजरमे कटमटी हुअए लगलै। फेर िजनगी
भारी हुअए लगलै।
हँसी-खुशीसँ जीवन-यापन करैबला पिरवार एहन िİथितमे पहुँिच गे ल जे सँझक-
सँझ चुिŎ निह पजरैत। दोसर कोनो लूिर निह। अपन खसैत िजनगी देिख कपली
पितक मुँह िदिश तकैत बाजिल- ‘‘एना कते िदन दुख काटब ?  जखन हाथ-पएर
तना-उताड़ अिछ आ काज करए चाहै छी तखन की अही गामकँ सीमा-नाङिर छै क?
चलू एिह गामसँ।’’
पėीक िवचार सुिन सोमनक आँिख नोरा गे लै। िकछु बजैक िहĦमते निह
होइ। मने-मन सोचए लागल जे जािह लूिरक चलते एखन धिर जीलहुँ ओ लूिर  गामक िजनगी 55
आब मिर रहल अिछ। दोसर लूिर तँ अिछ निह। की करब?  असमजसमे ं पड़ल
पितकँ देिख कपली बजलीह- ‘‘दुिनयँ बड़की टा छै। जतै पेट भरत ततै रहब।
जिहना मेरचासँ आिब लछमीपुरमे एते िदन रहलॱ तिहना अइ गाम छोिड़ दोसर गाममे
रहब।’’
पėीक िवचारसँ सहमत होइत सोमन बाजल- ‘‘अहँक िवचार मािन लेलॱ। अइ
गामसँ चािरम िदन चिल जाएब। बीचमे जे दू िदन बँचल अिछ तइमे अहूँ आ हमहू ँ
गाममे टहिल कऽ सभकँ जना िदअनु जे जिहना एक िदन हँसी-खुशीसँ छाती लगेलहुँ
तिहना आब जा रहल छी। चु पचाप गामसँ चिल जाएब नीक नै हएत। गामसँ तँ
चुपचाप ओ भगैत अिछ जे अधलाह काज केने रहै त अिछ।’’
दुआिरए-दुआिरए दूनू Ćाणी गाममे घुिर सभकँ किह देलकै- ‘‘गामसँ चिल जाएब।’’
Ćात होइतिह दुनू Ćाणी घरक सभ सामानक मोटरी बािĠह ओसारपर रखलक।
भुखल पेट! सुखाएल मँुह! िनराश मन! तँ आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत।
ओसारापर बैसल एक-दोसराक मँुहो देखैत आ कनबो करैत। दुनूक करेज
छहोछीत भऽ गेल।
सबा बारह बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शाĠत। साफ मेघ। घामसँ तर-बþर,
माथपर मोटरी, हाथमे वी.आइ.पी. बैग नेने सोमनक बेटा रामदत आगनं पहुँचल। माए-
बापक दशा देिख छाती कॉपएं लगलैक। मेह जेकँ आगूमे ठाढ़। सोगे दुनूक आँॅिख
बž। बž आँिखसँ नोर टघरैत ! दुनू अधीर। करेजकँ थीर करैत रामदत बाजल-
‘‘बाबू।’’
बाबू शĤद कानमे पिड़तिह दुनू बेकतीक आँिख खु जलै। मुदा नोर टघिरतिह रहै।
िकĠतु आब नोरक ुप बदलए लगल। एखन धिर जे नोर सोगसँ खसैत ओ İनेहमे
बदिल गेलै। अकचकाइत सोमनक मुँहसँ िनकलल- ‘‘बौआ।’’
िबचिहमे झपिट कपली बाजिल- ‘‘बे ट-ट-अ-आ।’’
ओसारापर बैग-मोटरी रािख रामदत िपताकँ गोड़ लगै लए झुकल की तिह बीच
कपली उिठ कऽ दुनू हाथे पिजया कऽ पकिड़ चुĦमा लैत पुनः बाजिल- ‘‘भाग नीक
छेलौ बेटा जे हम सभ भँट भेिलयौ,  निञ तँ तँ कतऽ रिहतँ आ हम सभ कतऽ
रिहतॱ.......!’’
माएकँ गोड़ लािग रामदत मोटरी खोिल दू िकलो भिरक रसगुĪलाक पोलीिथन,
िकलो भिर कटलेट,  िकलो भिरक बीकानेरी भुिजयाक झोरा िनकािल,  घुसुका कऽ
रखलक। दुनू Ćाणीक भुखसँ जरल मन रहै। जिहना गाएक गौजुरा ब्चा माएक थन
िदिश आँिख गड़ा देखैत रहैत, तिहना रसगुĪला, भु िजया िदिश दुनूक नजिर एकाƇ भऽ
गेलै। दुनूक लेल नव वİÿ िनकािल फुटा-फुटा रखलक। चमकैत İटीलक थारी,
लोटा, िगलास, बाटी एक भागमे रखलक। चाह बनबैक केटली, कप, छžा, आयरन,
नािरयल तेलक िडĤबा आरो-आरो सामान िनकािल चĿिरकँ झाड़लक। जिहना चुिŎक
आिगमे उपरसँ थोड़बो पािन पड़लासँ उपर ठढ़ापन ं अबै लगैत,  तिहना दुनूक नजिर
चीज-वİतु देिख शीतल हुअए लगलै। एकदम İनानोपराĠतक शीतलता जकँ! सोमनक56 जगदीश Ćसाद मěडल
शीतल मनसँ मधुर शĤद िनकललै- ‘‘ब्चा गरमाएल छह। पिहने नहा लएह। तखन
मन चैन हेतह।’’
माए-बापक मँुह देिख रामदत बाजल- ‘‘बाबू हमरो भूख लागल अिछ। पिहने
कनी-कनी खा िलअ। पछाित नहाएब।’’
किह रसगुĪलाक पोलीिथनक िगरह खोिल दू बाकुट सोमनक आगू İटीलक
थारीमे आ दू बाकुट कपलीक थारीमे दऽ कटलेट,  भुिजयाक िगरह खोिल बाजल-
‘‘जते मन हुअए तते खाउ। नहाइक कोनो धड़फड़ी थोड़े अिछ?’’
अपनो मँुहमे रसगुĪला दैत, बैग खोिल, मनी बैग िनकािल रामदत सोमनक आगूमे
देलकिन। ुपैआ देिख कपलीक मन िटकुली जेकँ पहाड़पर चिढ़ गेल। धरतीकँ गोड़
लगलिन।
खाइत-नहाइत बेेर टिग गेलै। पछबिरया घरक छाहिर अधा आगनं पसिर गेल।
घरक कोनमे जिहना मोथीक पुरना िबछान िबछौल छल तिहना िबछौले रहै। घरसँ
िबछान िनकािल कपली पछबिरया ओसार लगा िबछौलक। उपरसँ नवका जाजीम
िबछौलक। नवका िसरमा रखलक। तीनू गोटे बैिस गप-सĢप करए लगलाह। सोमन-
‘‘बौआ, तू बौर कोना गेलहक?’’
मन पाड़ैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू हम बौुलहुँ कहँ ! मामा गाममे मुजģफरपुरक
छलगोिरया दुगŭक मुरती बनबैले आएल रहै। ओहो कुĦहारे रहए। तीन गोरे रहै।
ओकर छोटका बेटा हमरे एतेटा रहै। ओकरासँ हमरा दोİती भऽ गेल। ओकरे सगे ं
चिल गेिलयह।’’
िबचिहमे कपली टपकलीह- ‘‘रौ डकूबा, तोरा िचिठयो-पुरजी निञ पठौल भेलौ।’’
अपनाकँ İमरण करैत रामदत बाजल- ‘‘माए, काज िसखैमे सभ िकछु िबसिर गेल
रिहयौ। तोरो सबहक हालत तँ बँिढ़ये रहौ। तखन िचĠते कथीक किरतहुँ।’’
सामजİय ं करैत सोमन- ‘‘जिहया जे दुख िलखल छल से भोगलहुँ। यएह तँ
भगवानक लीला िछअिन। कखनो दुख तँ कखनो सुख।’’
रामदत- ‘‘बाबू एहन दशा भेलह कोना?’’
बेटाक बात सुिन सोमनक आँ िख भिर गेल, उþर देलक- ‘‘बौआ, अखन धिरक
जते लूिर-बुिŀ छलए से सभ पुरान भऽ गेल। नवका िसखलॱ नै।’’
िपताक बात सु िन रामदत नमहर सँस छोिड़ मुİकुराइत कहलक- ‘‘बाबू, हमरा तँ
छुिņये नै दैत रहए। बीस-बीस हजार ुपैआ मासमे कमाइ छी। तइपर सँ मूित्
बनबौिनहारक कतार लागल रहैए।’’
िबचिहमे कपली टोकलकिन- ‘‘बेटा, की सभ लूिर छौ?’’
मुİकुराइत रामदत कहए लगलिन- ‘‘माए, मािटसँ लऽ कऽ िसमटी धिरक मुरती,
नाच-तमाशाक परदा, घर सभमे िचÿ सभ बनबैक लूिर अिछ।’’
बेटाक बात सुिन सोमनक अहं जगलै। बाजल- ‘‘बौआ, जहन एते कमाइक लूिर
छह, तहन नोकरी िकए करै छह?’’
मुİकुराइत रामदत कहलकिन- ‘‘एते िदन जे नोकरी केलॱ ओ नोकरी निञ भेल।गामक िजनगी 57
साल भिर तँ मािटये सनैमे लािग गेल। साल भिर खढ़ बĠहैमे आ पिहल मािट लगबैमे
चिल गेल। तेसर साल मु रती बनबैमे लागल। चािरम साल मुरतीक आँिख बनबैमे
लागल। एिह साल पँचम बख्,  गुु दैछना चु का अएलहुँहँ। आब अपन कारोबार
करब। जखने अपन कारोबार हएत तखने ने दू-चािर गोटे िसखबो करत!’’
अपन मजबूरी देखबैत सोमन कहल- ‘‘बौआ, अपन िचĠता जते शरीरकँ नै खेलक
तइसँ बेसी तोहर खेलक। िकअए तँ हरदम मनमे नचैत रहए जे वशं अतं भऽ गेल।
जाबे दुनू परानी छी ताबै धिर....। मुदा आइ सबुर भऽ गेल जे जाबे बीटमे बँसक
चढ़Ġत रहै छै, ताबे उžैससँ बीस होइत जाइ छै मुदा िन्चँ मुँहे होइते सरसरा कऽ
कोपरो सुखए लगै छै। आशा भऽ गेल जे हमरो वशं एकसँ एĸैस हएत!’’
बेटाकँ आधुिनक मुित्कार ूपमे पािब सोमन गद्-गद् भऽ गेल। हृदए अƪादसँ
भिर गेलै !  नजिर सहजिह बेटाक नजिरमे गिड़ गेलै। ğयान बढ़तं बँसक बीटमे
िबचरण करए लगलै...! मनमे भे लै जे बेटासँ इहो नव गुण सीखत। एखनो ई दुनू
ĭयि्त बहुतो काज कऽ सकैए।

0 comments:

टिप्पणी पोस्ट करें