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गुरुवार, 31 मई 2012

अनेुआ बेटा


अनेुआ बेटा

तेसिर सँझ। अĠहिरयाक चौठ रहने चान तँ निञ उगल छै मुदा पूब िदिश धाही
िछटकए लगल छलै। सुनसान अĠहार देिख िकछु षण पिहनिह एकटा कुमािर,
समाजमे लोक-लाज बँचबैक िखयालसँ दस िदनक जनमल ब्चाकँ रİताक िकनछिरमेे
रािख अढ़े-अढ़ आगनं चिल गे िल। ब्चाकँ नओ िदन तँ झँिप-तोिप कऽ बीमारीक
बहाना बना रखलक। मुदा घटना खुलैक दुआरे दसम िदन जी-जँित कऽ फेकलक
निह,  रİताक कातमे ओिरया कऽ रिख देलक। पँचे-सात िमनटक पछाित गगाराम ं
हाटसँ घर अबैत रहए। जनमौटी ब्चाक जे ुदन गगाराम ं सुनलक, एकाएक ओकर
पएर अिİथर भऽ गेलै। बीच बाटपर ठाढ़ भऽ ओ अवाज अकानए लगल। ई अवाज
तँ कोनो जानवर वा जĠतुक वा िचड़ैक तँ निह िथक। मनु्खक ब्चाकँ बोली बुिझ
पड़ैत अिछ। मु दा एिहठाम मनु्खक ब्चाकँ बोली भऽ कोना सकैत अिछ?  तहूमे
ककरो देखबो ने करै िछऐ। बँसक गारल खूँटा जेकँ गगाराम ं बीच बाटपर ठाढ़।
कने काल ठाढ़ रिह ओ आİते-आİते ब्चा िदिश पएर बढ़बए लगल। झल-अĠहार
रहने अिधक दूर देखबो ने करैत छल। खेतमे जेना कीड़ी-मकोड़ी। ्यो अपन माए-
बापकँ सोर पाड़ैत तँ ्यो अरामसँ गीत गबैत। तिहसँ सौँसे बाध अनघोल होइत
रहै। ब्चाक लग पहुँिच गगाराम ं बैिस ब्चाकँ िनहारै लगल। एकटा मन कहलकै- ई
तँ मनु्खक ब्चा छी। मुदा दोसर मन कहलकै-  एिहठाम ब्चा आएल कोना?
तरकारीक झोरा दूिबपर रिख,  दिहना हाथ ब्चाक देहपर दऽ हसोथै लगल। देह
िसहिर गेलै। रॲइयँ-रॲइयँ ठाढ़ भऽ गेलै। मुदा मनमे खुशी उपकलै। मन थीर कऽ
ब्चाकँ दुनू हाथे उठा लेलक। उठा कऽ ब्चाकँ पेटमे सािट,  वामा हाथे ब्चाकँ
थािĦह दिहना हाथे खढ़-पात पोछए लगल। ब्चा ओिहना पूव्वते कनैत रहए। खढ़
पोिछ गगाराम ं काĠहपर सँ गमछा उतािर ब्चाकँ लपेट लेलक। तरकारीक झोरा
काĠहमे टँिग छाती लगौने ब्चाकँ अपना ओिहठाम अनलक।
आगनं आिब गगाराम ं हँसैत घरवालीकँ कहलक- ‘‘आइ भगवान खु श भऽ एकटा
बेटा देलिन।’’
पितक बात सुिन अकचकाइत भु िलया लगमे दौगल आिब पितक कोरासँ ब्चा
अपना कोरामे लैत पुछलक- ‘‘कतए ई ब्चा भे टल ? आ-हा-हा, ब्चा तँ बड़ दीव
अिछ।’’
‘‘हाटसँ घुमैत काल बाटपर भेटल। एकर सेवा कु। जँ अĢपन बिन कऽ
आएल हएत तँ जीवे करत निञ तँ जिहना रİते-रİते आएल तिहना चिल
जाएत।’’ गामक िजनगी 25
पितक बात सु िन भुिलया मने-मन सोचए लागिल जे अपना तँ ने गाए अिछ आ ने
बकरी, जेकर दूध िपया ब्चाकँ पािलतहँु। अपने तँ दूध हेबे निञ करत िकएक तँ
बुढ़ाढ़ीमे सभ अगं सुखा गेल। िनराश मनमे भुिलयाक आशा जगलै। मनमे अएलै जे
अपन ने छाती सुिख गेल मुदा िपितऔत िदयादनी तँ िचलकौर अिछ। मन पिड़तिह
भुिलया भगवानकँ धĠयवाद दैत बाजिल- ‘‘जिहना भगवान सुखाएल बोनमे फूल
फुलौलिन तिहना ओकर अहारोक ओिरयान तँ वएह करिथन।’’
पचास बख्क गंगाराम। अड़तालीस बख्क भुिलया। मुदा जते थेहगर गगाराम ं
तिहसँ कम भुिलया। अड़तालीस बख्क भु िलया सािठ बख्सँ उपर बुिझ पड़ैत छिल।
झुनकुट बूिढ़ जेकँ। बू िढ़क सभ लषण भुिलयामे आिब गेल छलै मुदा कोरामे ब्चा
देिख भुिलयाक शरीरमे जुआनीक खून दौड़ए लगलै। नव उĜसाह,  नव-जीवन।
आनĠदसँ िवƫल नजिरसँ भुिलया पितकँ देखैत आ गगाराम ं पėीकँ। दुनूक मनमे
खुशीक िहलोर उठैत रहै। पािनक गुĤबारा जेकँ खुशी मँुहसँ िनकलए चाहैत रहै।
ब्चाकँ चुप रहै दुआरे भुिलया अपन छातीमे ब्चाकँ लगा लेलक। कनी काल ब्चा
छातीमे लिग मुँह बž केलक मुदा दूध निह भेटने फेर ओिहना कानए लगल।
गगारामक ं घरक बगलेमे िपितऔत भाए ुपलालक घर। ब्चाकँ छाती लगौने
भुिलया ुपलालक आगनं पहुँचिल। ुपलालक İÿी कबूतरी अपना ब्चाकँ दूध
पीयबैत रहए। तीन मासक ब्चा रहै कबूतरीक। भुिलयाक कोरामे ब्चाकँ कनैत
देिख अपना ब्चाकँ ओछाइनपर सुता भु िलयाक कोरासँ ब्चाकँ कोरामे लैत दूध
पीयबए लागिल। भुखल ब्चा,  हपिस-हपिस दूध पीबए लगल। ब्चाकँ दूध पीबैत
देिख भुिलया कबू तरी िदयादनीकँ कहलक- ‘‘भगवान तोरा सात गो बेटा आउरो
देथुन।’’
भुिलयाक बातकँ हँसीमे उड़बैत कबूतरी बाजिल- ‘‘चािरयेटा मे तँ अकिछ गेलॱ
आ सातटा आरो पोसब पार लागत। अपन अिसरवाद घुमा लौथु। जेतबे अिछ तेकरे
िनमेरा होए तेहीसँ बहुत हएत। फेर बात बदलैत बाजिल- दीदी, बुढ़ािढ़योमे जे िहनका
बेटा भेलिन से केहेन पोरगर छिन। िहनके जेकँ आँिख, मुँह, नाक लगै छिन। भैया
जेकँ िकछु ने बुिझ पड़ैए।’’
भुिलया- ‘‘सभ िदन तू एĸे रगं रिह गेलं। किहयो तोरा बजै-भु कैक लूिर निञ
भेलौ। जेठ-छोटक िवचार तँ बुझबे ने करै छीही। ककरो िकछु किह दै छीही। कोनो
गþरमे लाज-सरम तँ छौहे नै।’’
हँसैत कबूतरी दोहरबैत बाजिल- ‘‘एँह दीदी, िहनका अखन की भेलिनहँ, एकटा
के कहाए जे जोड़ो लिग जेतिन।’’
कबूतरीक बातसँ भुिलयाकँ तामस नै उठै। ब्चाक आनĠद हृदएकँ पािन जेकँ
कोमल बना देने छलै। भुिलया- ‘तोरे भैयाकँ हाटसँ अबै काल रİतामे ई ब्चा
भेटलै।’’
कबूतरी- ‘‘भेटुआ ब्चाक मँुह िहनका मुहसँ िकअए िमलै छै। ई हमरासँ िछपबै
छिथ।’’ 26 जगदीश Ćसाद मěडल
खॱझा कऽ भुिलया बाजिल- ‘‘अ्छा हो, हमरे भेल। आब तँ मनमे सबुर भेलौ।’’
बात बदलैत कबूतरी बाजिल- “दीदी, जिहना एकटा ब्चाकँ दूध पीयबै छी तिहना
अहू ब्चाकँ दू ध िपया देबिन। कोनो िक हमरा घरमे मौसरी नै अिछ जे ब्चाकँ
दुधकņू हुअए देबिन। लोकेक काज समाजमे लोककँ होइ छै िकने। िहनका अĠहार
घरमे दीप जरलिन। तइसँ िक हमरा खुशी निञ होइए।’’
कबूतरीक बात सुिन भुिलयाक मन गद-गद भऽ गेलै। भुखाइल ब्चाकँ पेट
भिरते िनž आिब गेलै। ब्चाकँ िबछौनपर सुतबै त कबूतरी बाजिल- ‘‘दीदी,  ब्चाकँ
एतै रहए देथुन। राित-िवराित जखैन भुख लगतै िपया देबै।’’
 ‘बड़बिढ़या’’ किह भुिलया अपना आगनं आिब पितकँ कहलक- ‘‘आब ब्चा जीबे
करत। बड़ दूध गोधनपुरवालीकँ होइ छै। दुनू ब्चाकँ पािल लेत।’’
ब्चाक लेल गगारामक ं मन कनै त। मुदा भुिलयाक बात सुिन मन हिरया गेलै।
मनमे एकटा शका ं जुर उठलै- ‘‘ब्चाकँ अपना अगना ं िकअए ने नेने अएलहुँ? आन
तँ आने छी।’’
पितकँ चोहटैत भुिलया कहलक- ‘‘अहँ पुुख छी,  तँ की बुझबै?  माएक की
मासचज् होइ छै से İÿीगणे बुिझ सकैए। जे माए एक िदन ब्चाकँ छातीसँ लगा लेत
ओ िजनगीमे किहयो ओिह ब्चाक अधला नै सोचत।’’
गगाराम ं चुप भऽ गेल। मुदा एकटा बात मन पड़लै। बाजल- ‘‘अपने दुनू गोरे ने
ओकर बाप-माए हेबै, तँ कोनो नाम तँ रिख देबै िक ने।’’
पितक बात सुिन भुिलयाक मनमे छिठयारक दृĮय आिब गेलै। मुİकी दैत
बाजिल- ‘‘आन ब्चाकँ तँ İÿीगण सभ िमिल कऽ नाओँ रखै छै । मुदा से तँ अइ
ब्चाकँ नै भेलै। अपने दुनू गोरे िमिल कऽ नाम रिख िदयौ।’’
भुिलयाक िवचार सुिन पित िबहुँसै त बाजल- ‘‘मगलं नाम रिख िदऔ।’’
सात मासक उपराĠत ब्चाक मुँहमे दँतो जनमए लगल आ ठाढ़ भऽ कऽ डेगा-
डेगी चलौ लगल। अž सेहो चाटए लगल आ पािन सेहो पीबए लगल। ब्चाक
िसनेह एते अिधक दुनू परानीमे रहै जे कखनो आँिखक परोछ होअय, से निह चाहए।
भुिलया बोइन करब छोिड़ देलक। अगना ं -घरक काज सĦहािर साबेक जौर ओसारेपर
बैिस बॉटए ं लागिल। ओकरे बेिच-बेिच दू पाइ कमा लैत छिल। अपना तँ साबे निह
रहै मुदा अिधयापर बँटैक लेल गाममे साबे भेटै । दुनू परानी गगारामकँ ं एते उĜसाह
बिढ़ गेलै जते दस बख् पिहने छलै। भिर-भिर िदन काज करैत मुदा थाकिन बुिझये
ने पड़ै। भुिलयाकँ जैखन मगलं माए कहए तैखन आनĠदसँ ओ उĠमत भऽ जाए।
पँच बख्क अवİथामे मगलक ं नाम िपता İकूलमे िलखा देलक। मगलं पढ़ए
लगल। पँचे िकलास तक पढ़ाइ गामक İकूलमे होइत रहै। पँचमा तक मगलं पिढ़
लेलक। दस बख्क भइयो गेल। मुदा दुनू परानीमे गगारामक ं देह एþे अĭवल भऽ
गेलै जे काज करैले लोक अढ़ौनाइ छोिड़ देलकै। कहु ना-कहुना दुनू परानी जौर
बँिट-बँिट गुजर करए। िजनगी भारी लागए लगलै। मुदा दसे बख्क मगलमे ं ञानक
उदए कनी-मनी भऽ गेलै। जिहना ब्चेमे हनुमान बाल सुज्कँ गीिर गेल छलाह, गामक िजनगी 27
तिहना। मगलं बापकँ कहलक- ‘‘बाबू अहँ दुनू गोरे काज करै जोकर नै रहलॱ।
हमरा मन होइए जे चाहक दोकान खोली। अपने डेिढ़यापर एकटा एकचारी बािĠह
िदअ, ओिहमे हम दोकान खोलब।’’
गगारामक ं मनमे जँचलै। मुदा चाह तँ गामक लोक पीबैत निह अिछ,  तखन
दोकान चलतै कोना? मुदा तइयो एकचारी बािĠह देलक। बाड़ीमे एकटा जीमरक गाछ
रहै ओकरा प्चीस ुपैयामे बेिच, चाह बनबैक बरतन-वासन मगलं कीिन लेलक।
चाहक दोकान मगलं शुु केलक। नव वİतुक दोकान गाममे। मुदा पिहल
दोकानकँ तँ मोनोपोली माने एकािधकार होइ छै। शुुमे तँ गामक लोक नव चीज पेय
बुिझ सेहĠते पीनाइ शुु केलक। मुदा धीरे-धीरे दोकान जिम गेलै। जइसँ एþे कमाइ
हुअए लगलै जे कहुना-कहुना गुजर चलऽ लगलै। तीन साल बीतैत-बीतैत दुनू परानी
गगाराम ं मिर गे ल। जाधिर गगाराम ं जीबैत छल ताधिर गाममे मगलक ं Ćित कोनो
तरहक िघरना निञ छलै मुदा गंगारामक मरलाक बाद लोकमे िधरना जागए लगलै।
मुदा तइयो दोकानक िबकरीमे कमी निञ अएलै, िकएक तँ समाजक लोक चाह-पािन
पीयब शुु कऽ देने छल।
चाहक दोकान केलाक उपराĠतो मगलक ं मनमे पढ़ैक िजञासा जीिबते रहै। खाइ-
पीबैसँ जे पाइ उगड़ै ओइसँ ओ िकताब, कागज, कलम कीिन-कीिन पढ़बौ करए आ
िलखबो करै। मरै काल गगाराम ं मगलकँ ं जĠमक इितहास सुना देने रहै। जािहसँ
मगलमे ं समाजक कुरीित, कुĭयवİथा जे करमी लþी जेकँ छाड़ने अिछ, ओिह िबĠदुपर
नजिर पहुँिच गेल छलै। तँ िकताबक अğययनक सगं -सगं समाजोक बेबहारक अğययन
करए लागल। चाहक दोकान चलबैत तँ दस गोटेक सगं गप-सĢप करैक लूिर सेहो
सीिख लेलक। ततबे निह ुपचन गामक िखसĸर। मुदा बड़ गरीब। सँझू पहरकँ
एक झँक चाहक िबकरी खूब होइ, बादमे गिहकी पतरा जाइ। जखन गिहकी पतरा
जाइ तखन ुपचन मगलक ं दोकानपर अबै। दू िगलास चाह िपया मगलं ुपचनक
िदमाग साफ कऽ दै। दू-चािरटा पछुऐलहा गिहिकयो रहै,  तिह बीच ुपचन पुरना
िखİसा उठाबै। एक घटा ं ,  दू घटा ं ,  तीिन-तीिन घटा ं तक ुपचन िखİसा कहै।
िखİसा सभ िदन बदिल-बदिल कऽ कहै। किहयो राजा-रानी, तँ किहयो रानी सरंगा
तँ किहयो रजनी-सजनीक। किहयो गोनू झा तँ किहयो डाकक। किहयो अŎा-ुदल
तँ किहयो दीना-भƖी। किहयो लोिरक तँ किहयो सलहेसक।
एिह ुपे मगलक ं बुिŀक बखारीमे िकताबक ञान, समाजक ञान आ िखİसाक
ञान जमा हुअए लगलै। राितमे जे िखİसा सुनै ओ िदनमे जखन समए भेटै, िलिख
िलअए। िलखै त-िलखैत पँितयो सोझ-साझ हुअए लगलै आ िजञासो बढ़ए लगलै।
एक िदन बेिर टगैत,  एक गोटे मगलक ं ऐठाम चाह पीबए आएल। देह-दशासँ
िबĪकुल साधारण। हाथमे एकटा चमड़ाक बैग। ओ आदमी  ‘भारत जागरण’ पिÿकाक
सĦपादक। गामक दशा-िदशाक अğययन करैक लेल गाम िदिश आएल छल। मगलसँ ं
गप-सĢप करैत ओ सĦपादक हेरा गेलाह। उĠमþ भऽ गेल। जेना मगलक ं हृदए आ
सĦपादकक हृदए एक ठाम भऽ कतौ सफरमे िनकलल हुअए, तिहना।28 जगदीश Ćसाद मěडल
भĸ टुिटतिह दुनू गोरे हँसए लगल। सĦपादक कहलिखन- ‘बौआ,  अहँ चाह
बनाउ। एखन धिर हमहुँ आइ चाह नै पीने छलॱ। आइ हम रहब। िनचेनसँ गप-सĢप
करब।’
मगलं चाह बनबए लगल। चाह बनल। दुनू गोटे पीलक।
खेला-पीलाक बाद, राितमे दुनू गोटे एĸे िबछानपर बैिस गप-सĢप करए लगल।
जे िकछु िखİसा-िपहानी मगलं िलखने छल ओ हुनका–-सĦपादककँ-  आगूमे रिख
देलक। उनटा-पुनटा सĦपादक जी देखए लगलिथ। भाषा-शैली तँ निह जँचलिन मुदा
िवषए-वİतु हृदएकँ पकिड़ लेलकिन। हँसैत बजलाह- ‘‘बड़ सुĠदर वİतु सभ अिछ।
एकरे तकैले हम आएल छी।’’
किह बैग खोिल िकछु पिÿका आ िकछु िकताब दैत कहलिखन- ‘‘एिहमे
िलखैक तौर-तरीका िनधŭिरत कएल अिछ। एकरा ठीकसँ पिढ़ जे आधार िनधŭिरत
अिछ,  ओिह अधारपर िलखब। हम सĦपादक छी। मािसक पिÿका चलबैत छी।
अहँक एक-एक कथा सभ मासक पिÿकामे छापब। एक कॉपी अहूँकँ पठा देल
करब।’
तीन-चािर घटा ं धिर सĦपादक जी मंगलकँ बुझबैत रहलिखन। भोरे सु ित उिठ
चाह पीिब ओ चिल गेलाह।
मगलक ं कथा पिÿकामे मासे-मास छापए लगल। मगलक ं अनेको पाठकमे एकटा
लड़की सेहो। नाम सुनएना। दश्न शाİÿसँ एम.ए.मे पढ़ैत। पँचम मासक पिÿकामे
सĦपादकजी मगलक ं पिरचएमे एकटा उपĠयासक चरचा सेहो कऽ देलिखन, नाम छलै
‘मरल गाम’। सु नएनाक िपता वकील। सुनएनाक मन  ‘मरल गाम’  नाम पिढ़ नाचए
लागल। मनमे अाबए लगलै जे हमर देश तँ गामक देश छी। जखन गामे मरल अिछ
तखन देशकँ की कहबै?  ई िवचार सुनएनाक मनमे उड़ी-बीड़ी लगा देलक। जे
सुनएना िपताक सोझँमे भिर मँुह बजैत निह ओ सुनएना आइ िपतासँ िडİकस करैले
तैयार भऽ गेिल।
कोट्सँ आिब वकील सैहेब चाह पीिब टहलैले गेलाह। टहिल-बूिल कऽ दोसर
सँझमे आिब कौŎुका केसक तैयारीक लेल फाइल िनकाललिन। पėी चाह आिन कऽ
देलिखन। चाह पीिब,  पान खा वकील सहाएब फाइल खोलैत रहिथ आिक सुनएना
आिब कऽ आगूक कुरसीपर बैिस बाजिल- ‘‘बाबूजी, एकटा सवाल मनमे घुिरया रहल
अिछ। ओ कने बुझा िदअ?’’
 ‘की?’
‘आइ पिÿकामे पढ़ने छलहुँ जे सचमुच गाम मरल अिछ? जँ गाम मरल अिछ तँ
देश गामक छी। देशकँ की कहबै?’
सुनएनाक Ćķक गभीरतापर ं नजिर निह दऽ वकील सैहेब कहलिखन- ‘ई
सािहĜयकार लोकिनक समझ िछअिन, तँ एिहपर िकछु निह किह सकै िछअह।’
सािहĜयकारो तँ अही समाजक लोक होइ छिथ। हुनको आने लोक जेकँ िजनगी
छिन। तखन ओ एहन िवचार िकअए िलखलिन?’ गामक िजनगी 29
‘सािहĜयकारक बात सािहĜयकारे बुिझ सकैत छिथ। हम तँ बकील छी कानूनक
बात बुझै िछऐ। एखन तूँ जा, हम एकटा केसक तैयारी करब।’
सुनएना उिठ कऽ चिल गे िल। अपना कोठरीमे बैिस कऽ िवचार करए लागिल।
जिह देशक गाममे ने पािन पीबैक ओिरयान छै, ने खाइक लेल सभकँ सतुिलत ं भेाजन
भेटै छै,  ने भिर देह कपड़ा भेटै छै,  ने रहैक लेल घर छै, ओिह देशकँ मरल नै
कहबै तँ की कहबै । एखनो लोक सरल पािन पीबैत अिछ, कहुनाकँ िकछु खा िदन
कटैत अिछ,  गाछक िन्चँमे आिग तािप समए िबतबैत अिछ,  हजारो रगकं रोग-
ĭयािधसँ घेरल अिछ,  ओिह देशकँ की कहबै?  हजारो बख्क मनु्खक इितहासमे
एखनो धिर सरİवतीक आगमन सभ मनु्ख धिर नै भेल अिछ,  ओिह देशकँ की
कहबै? ढेरो Ćķ सुनएनाक आगूमे ठाढ़ भऽ गेल रहए। मन घोर-घोर हुअए लगलै।
अचेत जेकँ सुनएना कुरसीपर ओगिठ ं सोचए लागिल। सोचैत-िवचारैत अतमे ं एिह
Ćķपर आिब अटिक गेिल जे िकताबक भँज लगा कऽ पढ़ी। मुदा िकताब भेटत
कþऽ। फेर मन एलै जे िकताब िलखिनहारे लग पहुँिच िकताबक भँज लगाबी।
पिÿका िनकािल लेखकक पता पुरजीपर िलखलक।
दोसर िदन सुनएना मगलक ं भँज लगबै िबदा भेिल। नओ बजेक समए।
िभनसुरका गिहकीकँ सĦहािर मगलं केतली,  टोिपया, ससपेन,  िगलास इĜयािद बरतन
दोकानक आगुमे रिख, चुिŎसँ छाउर िनकािल चुिŎ िनपैत। सुनएना चाहक दोकानपर
एिह दुआरे पहुँचल जे एिहठामसँ सॱसे गामक लोकक भँज लिग सकैए। दोकानपर
पहुँिच मगलकँ ं पुछलक- ‘‘एिह गाममे मगलं नामक एक ĭयि्त छिथ, हुनकर घर बता
िदअ।’’
अपन नाम सुिन मगलं चॱिक गेल। मुदा चुĢपे रहल। जेना मने-मन गाममे
मगलकँ ं तकैत रहए। सुनयनो सएह बुझलक। कनी काल गुĦम रिह बाजल- ‘‘बहीन
जी, अगर मगलं एिह गाममे हएत तँ जुर भँज लगा देब। मुदा एखन हमरा ऐठाम
आएल छी,  तँ िबनु खेने-पीने कोना जाएब?  ई तँ िमिथला िछऐ। जिहना घरवारीक
लेल İवागत करब अिनवाय् अिछ तिहना तँ अितिथयो लेल।’
मगलक ं बात सुिन सुनएनाक मनमे जेना िपयासलकँ शीतल पािन भेिट जाइत,
तिहना भेल। बँसक फŇाक बनौल बंचपर सुनएना बैिस गेिल। हाथ धोए मगलं
सİपेन अखािर, चुिŎ पजािर चाह बनबए लगल। ƙंच परसँ उिठ सुनएना चुिŎ लग
जाए चाहलक आिक कुतŰक िनचला कोन फņीमे फँिस गेलै, जइसँ फिट गेलै। मुदा
तेकर िचĠता निह कऽ सुनएना मगलं लग बैिस गेल। लगमे सुनएनाकँ बैसैत देिख
पुछलक- ‘मगलसँ ं कोन काज अिछ?’
सुनएना- ‘‘मगलं सािहĜयकार छिथ। हुनकर िलखल एकटा उपĠयास  ‘मरल गाम’
छिन। ओिह पोथीक भँज हम बजारमे लगेलहुँ मुदा कतौ निह भेटल। तँ
िलिखिनहारेक भँज लगबए एलहुँ।’’
सुनएनाक बात सु िन मगलं नमहर सँस छोिड़ बाजल- ‘‘मगलकँ ं अहँ कोना जनैत
छी?’’ 30 जगदीश Ćसाद मěडल
सुनएना- ‘‘हुनकर िलखल कथा हम  ‘भारत जागरण’ मे पढ़ैत छी ओिहमे  ‘मरल
गाम’ उपĠयासक चरचा देखिलऐक। जकरा पढ़ैक इ्छा मनमे भेल। तँ एलहुँहँ।’’
मगलं बुिझ गेल। खुशीसँ मन ओलिर गेलै। मनमे अएलै जे िपयासलकँ पािन देब
ओहने आवĮयक होइत अिछ जेना भूखलकँ अž। मुदा हमरा तँ एĸे काॅपी अिछ जे
िलखने छी। जँ ई काॅपी दऽ देबै तँ अपन साल भिरक मेहनत चिल जाएत। मुदा
निह देब तँ आरो महापाप हएत। फेर मनमे अएलै जे अपना ऐठाम पढ़ैले दऽ िदयै आ
किह िदयै जे जिहया हमर िदन-दुिनयँ घुरत तिहया छपाएब। छपेलाक उपराĠत अहँकँ
देब। ताबे एिहठाम रिह पिढ़ िलअ।’’
तिह बीच चाह बनल। दुनू गोटे पीलक। चाह पीिब सुनएना बाजिल- ‘‘मगलक ं
भँज लगा िदअ।’’
िविİमत भऽ मगलं बाजल- ‘‘हमरे नाम मगलं छी। हमहॴ उपĠयास िलखने छी।
मुदा छपाओल निह अिछ। िसफ् िलखलेहे टा अिछ। तँ हम आƇह करब जे एिहठाम
रिह पिढ़ िलअ। जिहया छपाएब तिहया अहँकँ एक काॅपी जुर देब।’’
मगलक ं बात सुिन सुनएना अचिभत ं भऽ गेिल। पएरसँ माथ धिर मगलकँ ं
िनङहारए लागिल। आिगक धुँआ, चुिŎक कारीखसँ मगलं बेदरगं भेल। देहक वİÿ
परसौतीक वİÿ जेकँ,  सौँसे देहसँ गरीबी झक-झक करैत। मगलक ं बगए देिख
सुनएनाक आँिख नोरा गेलै। नोर पोछैत सुनएना बाजिल- ‘‘एिहठाम रिह कऽ हम
उपĠयास निह पिढ़ सकब। िकएक तँ कोनो पोथी पढ़ैक मतलब होइत अिछ जे ओिह
पोथीक िवषए-वİतुकँ नीक जेकँ बुझब। से धड़-फड़मे कोना सभवं अिछ?’’
सुनएनाक िवचारमे गभीरता ं देिख मने-मन मगलं सोचए लगल। आĜमाक उĜसाह
बढ़ए लगलै। सुनएना िदिश तकलक। सुनएनाक आँिखमे पढ़ैक भूख जोर पकड़ने
देखलक। मनमे एलै जे हमहूँ तँ अनके लेल िलखने छी। तखन छपौलासँ हजारो
हाथ जेतै मुदा एखन तँ एĸे हाथ जा रहल अिछ। मनमे सबुर अएलै जे कमसँ कम
एĸोटा पढ़िनहारक हाथ तँ जाएत। तिह बीच सुनएना बाजिल- ‘‘जिहना हम काॅपी
एिहठामसँ लऽ जाएब तिहना पढ़लाक बाद घुमा देब। तँ पोथी हरेबाक कोनो सभावने ं
नै अिछ। एिहठाम रिह पढ़ैमे हमरो लाचारी अिछ। लाचारी ई अिछ जे भिर िदन तँ
हम कतौ रिह सकै छी मुदा सूयŭİतक बाद घर पहुँचब जुरी अिछ।’’
मगलक ं िवचारमे कने İनेह एलैै। बाजल- ‘‘बड़बिढ़यँ, हम अहँकँ पोथी दऽ दै
छी। आगूक बात अहँ जानी।’’
हाथमे पोथी अिबते सुनएनाक मनमे खुशी अएलै। एक टकसँ पोथी देिख मगलं
िदिश तािक मुिİकया देलक। मने-मन मगलं सु नएनाकँ पढैत आ सुनएना मगलकँ। ं
सुनएना हँसैत िबदा भऽ गेिल।
सुनएना एम.ए.  नीक जेकँ पास केलक। नारी अिधकारक सम्थक वकील
साहेब। मुदा मन ओतए ओझरा जािन जेतए देखिथ जे नारी िसफ् एĸे-आध िबĠदुपर
निह,  जीवनक सभ षेÿमे जकड़ल अिछ। जेकरा मेटाएब िधया-पुताक खेल निह।
किठन सघष्सँ ं हएत। कतौ वैचािरक सघष् ं करै पड़त तँ कतौ बलक। एिह िवचारमेगामक िजनगी 31
वकील साहब कुरसीपर बैिस सोचैत रहिथ। सँझक समए। पėी चाह बनौने
एेलिखन। टेबुलपर चाह रािख,  बगलक खाली कुरसीपर बैिस कहलिखन- ‘‘अपना
सबहक पढ़ल-िलखल समाजक पिरवारमे सुनएना अिछ तँ ने मुदा जँ एहेन बेटी
िकसानक घरमे रहतै तँ लोक ओकरा एना उĠमु ्त रहए दैतै !’’ चाहक चुसकी लैत
वकील साहेब पुछलिखन- ‘‘अहँ की कहए चाहैत छी, कने खोिल कऽ बाजू।’’
‘‘सुनएनाक िबआह कऽ िलअ। तखन तँ मनोज रहत की ने ओ तँ बेटा धन
छी। बेटा-बेटीक िबआह करब माए-बापक अिनवाय् कत्ĭय छी। मुदा हमरा मनमे
एकटा नव िवचार अिछ। ओ ई जे सुनएनाकँ सेहो पूिछ िलऐ।’’
सुनएनासँ पूछैक बात सुिन पėी ढोढ़ सँप जेकँ हनहनाइत बाजिल- ‘‘लोक की
कहत?  आइ धिर ककरा देखिलऐ जे माए-बाप बेटा-बेटीसँ पूिछ कऽ िबआह करैत
अिछ।’’
पėीक िवचार सुिन वकील साहेब मने-मन सोचए लगलाह जे नारीकँ माÿ पुुखे
निह नािरयो दािब कऽ रखै चाहैत अिछ। अजीब घेरा-बदीमे ं नारी फँसल अिछ। मुदा
अपन िवचारकँ मनेमे रािख सुनएनाकँ सोर पाड़लिखन। अपना कोठरीसँ िनकिल
सुनएना आएिल। कुरसीपर बैसिल। सुनएना माए िदिश देखए लागल। तामसे माए पित
िदिश देखैत। वकील साहेब सुनएनाकँ कहलिखन- ‘‘बाउ, आब तूँ एम.ए. पास कइये
लेलह। माए-बापक दाियĜव होइत छैक बेटा-बेटीक िबआह करब। तँ हमहूँ अपन भार
उतारए चाहै छी। तोरो िकछु बजैक छह।’’
िपताक बात सु िन सुनएनाक देहमे कँप-कँपी आिब गेलै। मनमे थोड़े ओज। मुदा
असिथरसँ बाजिल- ‘‘बाबूजी, िवआह तँ सभ पुुष-नारीक लेल अिनवाय् Ćिƅया िछऐ।
जािहसँ सृिƠक िवकास Ćिƅयामे सहयोग होइ छै। रहल बात जे िवआह केहेन
होअए। एखन जे देिख रहल छी ओ नĤबे-पनचानबे Ćितशत अनमेल िबआह होइत
अिछ। कतौ धनक िमलानीसँ तँ कतौ दहेजक चलैत,  कतौ कुल-मूलक चलैत तँ
कतौ िकछु। मुदा हमरा िवचारसँ िबआह हेबाक चाही मनक िमलानीसँ। जे िटकाउएटा
निह आनĠदमय सेहो हएत।’’
सुनएनाक बात सुिन माए उþेिजत होइत बाजिल- ‘‘बेटी, हमरा सबहक िमिथलाक
परĦपरा रहल अिछ जे ई िवआह काज माए-बापक िवचारसँ होइ नै की बेटा-बेटीक
िवचारे। िकĠतु जँ बेटा-बेटीक िवचारसँ िबआह हएत तँ समाज ढनमना जाएत।’’
सुनएना बाजिल- ‘‘बड़ सुžर बात कहलीही माए मुदा परĦपराक भीतर जे दुरगुण
छैक ओहूपर नजिर देमए पड़तौ।’’
मुँहपर हाथ देने वकील सहाएब चुप-चाप सुनैत रहिथ। सुनएनाक तक्क आगू
माए कमजोर पड़ैत गेलीह। मुदा तैयो चुप होइले तैयारे निह छलीह। सामजİय ं करैत
वकील सैहेब सुनएनाकँ कहलिखन- ‘‘बाउ, तूँ अĢपन िवचार दएह?’’
सुनएना बाजिल- ‘‘अहँ खच् कþे करए चाहै छी बाबूजी?’’
खच्क नाम सुिन वकील सहाएब चॱिक गेलाह। मुदा अपनाकँ िİथर रािख
कहलिखन- ‘‘बाउ, अĢपन की ओकाइत अिछ से तोहूँ जिनते छह। मुदा जे ओकाइत32 जगदीश Ćसाद मěडल
अिछ ओिहमे हम कजूसी ं नै करबह। दू भाए-बहीन छह। ई सĦपिþ तँ तोरे सबहक
िछअह।’’
सुनएना बाजिल- ‘‘बाबूजी, मनु्ख देहे आ धने पैघ निह होइए, पैघ होइए ञान
आ कत्ĭये। सभ İÿी चाहैए जे हमर जीवन-सगी ं बुिधयार आ कम्ठ हुअए। एखन
हम अहँकँ अितम ं िनण्ए निह दऽ रहल छी मुदा एते जुर कहब जे सोनपुरमे मगलं
नामक एकटा चाहक दोकानदार अिछ। ओकरा िकयो ने छै। मुदा ओकर जे काज
आ बुिŀ छैक ओ ओकरा एक िदन महान सािहĜयकारक ुपमे दुिनयँक बीच अनतै।
एखन ओकरा गरीबी जरजर बनौने छै। गरीबीक जालमे ओ एना ओझरा गेल अिछ
जािहसँ िनकलब किठन छैक। िकĠतु जँ ओकरा ओिह गरीबीक जालसँ िनकालल जाए
तँ ओ जुर उगै त सूय् जेकँ अकासमे चमकए लगत।’’
वकील सहाएब कहलिखन- ‘‘बाउ, यिद तूँ हृदएसँ ओकरा चाहैत छह तँ हमरा
िदिशसँ कोनो आपिþ निह। मुदा एखन समए रहैत िवचािर लैह।’’
सुनएना बाजिल- ‘‘अनेक िवषमता रिहतो हमरा दुनू गोटेक बीच आĜमाक समता
अिछ। हमहूँ नारीक सबं धमे ं िकछु िलखए चाहै छी। िकएक तँ अपना एिहठाम नारीक
Ćित जे अदौसँ अखन धिर अĠयाय होइत रहल अिछ ओ हमरा हृदएकँ दलमिलत कऽ
देने अिछ। दुिनयँक सुĠदरसँ सुĠदर वİतु हमरा फीका लिग रहल अिछ।’’
वकील सहाएब कहलिखन- ‘‘बाउ, हम तोहर िवचारकँ मािन लेिलयह। तूँ अपनेसँ
जा कऽ देिख आबह जे कते मदितसँ ओ मगलं उिठ कऽ ठाढ़ हएत। हम ओते मदित
कऽ देबै।’’
िपताक िवचार सुिन सुनएना हँसैत अपना कोठरी िदिश िबदा भेिल। सुनएनाक
िवचारपर वकील सहाएब मने-मन गौर करए लगलिथ। मुदा पėीक मनक तामस आरो
बिढ़ते गेलिन।

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