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गुरुवार, 31 मई 2012

RIKSHAAVALA


िर्साबला

‘ओ िर्शा, ओ िर्शा।’ - कने फिड़ĸेसँ जीबछ जोरसँ बाजल। हाथमे बĦबैया बैग,
िजĠस पेĠट आ शट् पहीिरने,  दिहना हाथमे चौड़गर घड़ी। फुल जुþा,  मौजा सेहो
लगौने। बĦबैये िहĢपी कट केश,  बु्चा मोछ आ आँिखपर चĮमा। बचनू िर्शाबला
अपन ताशक सगीकं सगं ताश खेलाइत। ताशो ओिहना निह खेलैत, एक सेटपर चाु
गोटेक चाह-पान खच्, हरलाहा पाटŰकँ देमए पड़ैत। पँचटा लाल बचनूक जोड़ाकँ।
तँ एĸेटा सेठ होइमे बाकी। एकटा लाल हएत, चाह-पानक जोगार लगत। तँ एकाƇ
भऽ बचनू लालक पाछु िदमाग लगौने। ताशक चौखड़ी लग आिब जीवछ दुइभेपर बैग
रिख ुमालसँ मुँह लग हॱकए लगल। कने काल हॱिक िर्शाबलाकँ चिड़अबैत
कहलक- ‘हौ भाय, हमरा बहुत दूर जाइक अिछ, झब दे चलह?’
ताश परसँ नजिर उठा, जीबछ िदिश देिख बचनू बाजल- ‘भाय, केहेन सुĠदर ठढ़ा ं
छै, कनी सुसता लाए। तोरो देखै िछअह जे पसीनासँ तड़-बþर भेल छह। हमरो
एĸेटा लाल बाकी अिछ, दू-तीन खेपमे भइये जाएत। अगर जँ अपन लाल निहयो
हएत आ िवरोिधयेकँ दूटा कारी भऽ जेतै, तैयो जीत हेबे करत।
बचनूक बात सुिन जीबछ शटŸ आ गिजओं िनकािल कऽ रौदमे पसािर देलक।
आसीन मास। तीख रौद। तइ परसँ गुमकी सेहो। रेलबे İटेशनसँ जीबछ पएरे
आएल। िकएक तँ İटेशनक बगलेमे तेहेन ख्चा बािढ़मे बिन गेल जे िर्शो आ
टमटमोक राİता बž भऽ गेलै। पएरे लोक कहु ना कऽ थाल-पािनमे टपैत। बािढ़ तँ
तेहेन आएल छल जे जँ İटेशन ऊँचगर जमीनपर निह रहैत तँ ओहो भिस कऽ कतए-
कहँ चिल जाइत। मुदा तैयो İटेशनक पूबिरया गुमती, पुल आ आध िकलोमीटर रेलबे
लाइन दहाइये गेल। रेलवेक दिछन तेहेन मोइन फोिड़ देलक जे गािड़ओ बž भऽ
गेल। डेढ़ मासमे पुलो बनल आ गािड़यो चलब शुु भेल।
गाममे िर्शा बचनुएटा कँ। जािहसँ कोनो तरहक Ćितयोिगता निह। Ćितयोिगता
तँ शहर-बजारमे होइत, जिहठाम सैकड़ो-हजारो िर्शा रहैत। अनेरो िर्शाबला सभ
िर्शापर बैिस,  इमहरसँ उमहर घुमबैत आ बजैत- ‘कोट-कचहरी......बंक.......पोİट
आॅिफस.......  कओलेज....  İकूल.....  İटेशन.....  बस İटेěड......  अİपताल....  बड़ा
बजार..... िसनेमा चौक...... डाकबगला ं ..... भगतिसहं चौक..... आजाद चौक।
मुदा से तँ गाममे निह। मुदा तँ िक गामक िर्शाबलाकँ कमाइ निह होइत। खूब
होइत। एक तँ गामक क्ची रİता, तइ परसँ जहँ-तहँ टूटलो आ गहूम पटौिनहार
सभ कटनौ। एहेन सड़कमे दोसर कोन इजनबला ं सवारी सकत। तँ गामक सवारी
िर्शा। जािहसँ गामक बेटी-पुतोहूक िवदागरी िनमहैत। धĠयवाद तँ िर्शेबलाकँ दी जे76 जगदीश Ćसाद मěडल
बेचारा छातीपर भार उठा,  कखनो चिढ़ कऽ तँ कखनो उतिर कऽ पार लगबैत।
किठन मेहनतक पाइ कमाइत।
अखन धिर ताशक खेल निह फिड़आइल। िकएक तँ कखनो लाल किम जाए तँ
कखनो कारी। अगुताइत जीबछ बाजल- ‘भाय,  ताश नै फिड़ऐतह। बहुत दुरİत
जाइक अिछ। झब दे चलह। निञ तँ अĠहार भेने तोरो िदĸत हेतह आ हमरो अबेर
भऽ जाएत। कहुना-कहुना तँ ऐठामसँ सु्गापņी पँच कोस हएत।’
बचनू- ‘हँ, से तँ पँच कोससँ कम निहये हएत। मुदा तइसँ की? ई की कोनो
शहर-बजार िछऐ जे राितक कोन बात जे िदने देखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण
होइ छै। ने रİतामे भीड़-भड़ĸा आ ने कोनो चीजक डर। िनचेनसँ जाएब।’
गामक बीचमे चौबņी। जिहठाम पान-सातटा छोट-छोट दोकान। जिहसँ गामोक
आ आनो गामक लोक चौक कहए लगल। चौकक पछबिरया कोनपर एकटा खूब
झमटगर पाखिरक गाछ। जिहपर हजारो िचड़ैक खँता। िदन भिर िचड़ै सभ चराउर
करए बाहर जाइत आ गोसँइ िन्चा होइतिह पितआनी लगा-लगा गाछपर अबए लगैत।
कतेको रगकं िचड़ै तँ सभ जाितक िचड़ै अपन-अपन सगोर ं बना-बना अबैत। ततबे
निह, गाछक डािरयो बँिट नेने अिछ। एक जाितक िचड़ै एक डािरपर खँता बनौने
अिछ। तँ एक जाितक िचड़ैसँ दोसर जाितक िचड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने
झगड़ा-झझट। ं मुदा अपनामे एक जाितक बीच नीक-अधलाक गप-सĢप जुर होइत।
कथा-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ रामायण-महाभारतक िकİसा-िपहानी जुर होइत। पान-पुनक
चरचा सेहो करैत। अधला काज केिनहारकँ डँटो-फटकार दैत आ जुरिमनो करैत।
ओिह गाछक िन्चँमे बाटो-बटोही रौदमे ठढ़ाइत ं आ पािन-बुनीमे सेहो जान बँचबैत।
ताशक चौखड़ी सेहो जमैत।
बचनुक बात सुिन जीबछ पेĠटक पैछला पौकेटसँ िसगरेटक िडĤबा आ सलाइ
िनकाललक। एकटा िसगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनुओकँ देलक। दुनू गोटे
िसगरेट लगा,  िर्शापर चिढ़ िबदा भेल। किनये आगू बढ़ल आिक बचनू जीबछकँ
पूछलक- ‘भाय तूँ बĦबैमे रहै छह?’
‘हँ’
‘मन तँ हमरो बहु िदनसँ होइए मुदा पलखितये ने होइए जे जाएब।’
‘ओइ ठीन मन तँ खूब लगैत हेतह?’
‘एँेह भाय मन। की कहबह? जखैिनये डेरासँ िनकलबह आिक रगं -िबरगकं छौँ ड़ी
सभकँ देखबहक। उमेरगरो सभ जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक तँ बुिझ पड़तह
जे कुमािरये अिछ। मुदा छउरो सभ की ओइसँ कम अिछ। एक तँ ओिहना जे छउरी
सभ दामी-दामी कपड़ा पहीनने अिछ आ सौँसे देह झक-झक करै छै। तइपरसँ छउरो
सभ किरĸा चĮमा पहीन लेतह आ िनङहािर-िनङहािर देखैत रहतह। चĮमो की कोनो
एĸी-दुĸी रहै छै। जखैिनये आँिखमे लगेबह आिक देहपर कपड़ा बुिझये ने पड़तह।’
‘ओहन चĮमा हमरा सभ िदिश कहँ छै, हौ।’ गामक िजनगी 77
‘ऐँह, ओइ ठीन िवदेशी चĮमा सभ िबकाइ छै की ने। देहातमे ओहन चĮमा के
कीनत।’
चौकसँ किनये उþर एकटा ताड़ीक दोकान। चािर-पँच कŇाक खजुरबोनी।
बीच-बीचमे ताड़क गाछ सेहो। उþर-दिछने राİता। पछबािर भाग ताड़ीक दोकान।
ताड़ीक दोकान देिख जीबछ बचनुक पीठमे आगुरसँ इशारा करै त रोकैले कहलक।
बचनुक मनमे भे लै जे भिरसक पेशाब करत। िर्शा रोिक उतिर गेल। जीबछ
बाजल- ‘भाय, ताड़ी दोकान देखै िछऐ। चलह दू घॲट पीिब लेब, तखन चलब। हमहॴ
पाइयो देबै।’
ताड़ीक नाम सुिन बचनू कहलक- ‘ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी मुदा ताड़ी पीिब कऽ
ने िर्शा चलबै छी आ ने ताड़ी पीिनहारकँ िर्शापर चढ़बै छी। तँ अखैन ताड़ी-दाु
बž करह। जखैन घरपर पहुँचबह तखैन जे मन हुअह से किरहह।’
‘भाय, ओतऽ भेटत की नै भेटत, अखैन तँ आगूमे अिछ।’
‘तब अखैन नै जाह। ताड़ी कीिन कऽ नेने चलह। गामेपर दुनू गोटे पीिब लेब
आ राितमे रिह जइहह।’
‘अइठीन कतऽ रहब?’
‘से की हमरा घर-दुआर नै अिछ। ओतै रिह कऽ राित बीता िलहह। भोरे पहुँचा
देबह।’
‘अ्छा, ठीक छै, चलह।’
दुनू गोटे ताड़ी दोकान िदिश बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घै लक-घैल ताड़ी
फेनाइत देखलक। घैलक पितआनी देिख मने-मन सोचए लगल जे हमरा होइ छलए
जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबैए। मुदा से निह गामो-घरक लोक खूब पीबैए।
प्चीस-तीस गोटे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाइपर बैिस तािड़ओ
पीबैत आ चखनो खाइत। िकयो-िकयो असकरे पीबैत तँ िकयो-िकयो दू-दू, तीन-तीन,
चािर-चािर गोटे क सगोरमे। ं िकयो िखİसा कहैत तँ िकयो गीत गबैत। िकयो
अĠहागािहस गािरयो पढ़ैत। सभ उमगमे। ं जिहना ताड़ीक फेन उिधआइत तिहना
सबहक मन। ताड़ीक खटाइन गधं लिगते जीबछकँ होए जे कखै न दू िगलास चढ़ा
िदऐ।
ताड़ी दोकानसँ कने हिट दूटा बुिढ़या चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकानमे
मुरही, घुघनी बदामक कचड़ी आ दोसरमे चािर पँच रगकं माछक तुआ। ओगिरक ं
इशारासँ मझोलका डाबा देखबैत जीबछ बचनूकँ कहलक- ‘भाय, दुइये गोरे पीिनहार
छी, तँ वएह डाबा लऽ लाए।’
बचनू- ‘पिहने दाम पूिछ लहक?’
डाबाक कान पकिड़ जीबछ पासीकँ दाम पुछलक। तोड़-जोड़ करैत पंतीस
ुपैयामे पिट गेलै। पेĠटक जेबीसँ नमरी िनकािल ओ जीबछकँ देलक। नमरी पकड़ैत
दोकानदार कहलकै- ‘तािरये टाक दाम कटै िछअह। डाबा घुरा िदहह।’
‘बड़बिढ़यँ’ किह बचनू डाबा उठा लेलक। डाबाकँ चखना दोकानक आगूमे रिख78 जगदीश Ćसाद मěडल
बचनू मने-मन सोचए लगल जे औझुका तँ कमाइयो ने भेल। िधया-पूता की खाएत?
से निञ तँ तेना कऽ मुरही-कचड़ी कीिन ली जे सभ तुर खाएब। जेहने झुर कऽ कऽ
कचड़ी बनौने तेहने माछक कुिटया। एकदम लाल-बुĠद। माछक कुिटया देिख
जीबछक मुँहमे पािन अबए लगल। मन चटपटाए लगल। बचनूकँ कहलक- ‘भाय,
कते चखना लेबह?’
मने-मन बचनू िहसाब जोड़ए लगल। दू-दूटा कचड़ी आ दू-दूटा माछ दुनू ब्चाले
आ अपना सभले चािर-चािरटा। िकएक तँ गरम चीज होइ छै, तँ बेसी खराब करतै।
बाजल- ‘भाय,  एक िकलो मु रही,  एक िकलो घु घनी, सोलहटा कचड़ी आ सोलहटा
माछक कुिटया लऽ लाए।’
सएह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ िवदा भेल। िर्शा लग आिब बचनू
चखनाक मोटरी सेहो जीबछेकँ दऽ देलक।
चौकक रİता छोिड़ बचनू घर परक रİता धेलक। लगेमे घर। दुइयेटा घर
बचनूकँ। िर्शा रखैले एकचारी भनसे घरक पँजरामे देने। एकटा घरमे भानसो करै
आ जरनो-काठी रखै। दोसरमे सभतुर सुतबो करै आ चीजो-बौस रखै। अपना
दरबĔजा निह। मुदा घरक आगूमे धुर दसेक परती, जइपर सरकारी चबूतरा बनल।
घर लग अिबते बचनू िर्शा ठाढ़ कऽ आगनं बाढ़िन अनए गेल। बचनूकँ देिख
घरवाली कहलकै- ‘आइ जे भाड़ा नै कमेलॱ, तँ राित खएब की? अपने दुनू गोरे तँ
ओहुना सुित रहब मुदा ब्चा सभ कना रहत?’
िबना िकछु उþर देनिह बचनू बारहिन लऽ अगनासँ ं िनकिल गेल। चबुतराकँ
देहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुĠदर,  तँ बहािरतिह चमकए लगल।
चबुतराक चमकी देिख जीबछ बाजल- ‘भाय, जेहने मजगूत चबुतरा छह तेहने सुĠदर।
सगमरमर ं जेकँ चमकै छह।’
जीबछक बात सु िन बचनुकँ ओ िदन मन पड़लै जइ िदन ओ ठीकेदारकँ गिरऔने
रहए। मुİकुराइत कहलकै- ‘भाय,  ओिहना एहेन सुĠदर बनल अिछ। जे ठीके दार
बनबाबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नĦबर ंटा आ कोसीकातक
बाउलसँ बनबए चाहैत रहए। हम गामपर नै रही। जखैन एलॱ तँ देखिलऐ। देिखते
सौँसे देह आिग लिग गेल। मु दा ऐठाम रहए ्यो ने। दोसर िदन नाओ कोड़ए
ठीकेदारो आ जनो एलै। हमरा तँ गरमी चढ़ले रहए। जखने कोदािर लगौलक आिक
जऽनक हाथसँ कोदािर छीिन ठीकेदारकँ गिरअबै लगलॱ। जहँ गािर पढ़िलऐ आिक
ठीकेदारो गहुमन सँप जेकँ हुहुआ कऽ उठल। जहँ ओ जोरसँ बाजल आिक हमहू ँ
गिरअिबते दुनू हाथे कोदािरक बंट पकिड़ कहिलऐ, सार नाओ लइसँ पिहने तोरे कािट
देबह। मुदा सभ पकिड़ लेलक। डरे ठीकेदारो थर-थर कँपए लगल। तखन जा कऽ
एक नĦमर सभ िकछु -ंटा, िसमटी, बालु आिन बनौलक।’
‘जीबछ बाजल- ‘बाह।’
बचनू- ‘कनी उपर आिब कऽ देखहक जे की सभ बनबौने छी। देखहक ई
खेलाइ लऽ प्चीसी घर छी,  कौड़ीसँ खेलाएल जाइए। मुदा ई खेल समैया छी।गामक िजनगी 79
एकर चलती िसफ् आिसने टामे रहैए। कोजगरा िदन तँ लोक भिर राित खे लते
रहैए।’
दोसरकँ देखबैत- ‘ई मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाममे लोक एकरा मुगल-
पैठान कहै छै मुदा आन-आन गाममे एकरा कौआ-ठुŇी कहै छै। गोटीसँ खेलाइल जाइ
अए।’
तेसर घर देखबैत- ‘ई ब्चा सभक िछऐ। एकरा चैरखी-चैरखी घर कहै अए।
झुटकासँ खेलल जाइए।’
जीबछ- हौ भाय, तू तँ बड़ खेलौिड़या बुिझ पड़ै छह।’
बचनू- ‘हौ, िजनगीमे आउर छै की? खाइत-पीबैत, हँसी-चौल करैत िबता ली।
सभ िदन कमेनाइ, सभ िदन खेनाइ। कोनो हर-हर, खट-खट नै। िधया-पूताले तँ हम
अपने इİकूल खोिल देने िछऐ। खेती-पथारीक काजसँ लऽ कऽ िर्शा चलौनाइ, ंटा
बनौनाइ सभ लूिर हमरा अिछ। िधया-पूता तँ देिखये कऽ सीिख लेत।’
ओना जीबछ बचनुक गप सुनैत मुदा मन ताड़ीक खटाइन गधपर ं अँटकल। होइ
जे कखन दू िगलास चढ़ाएब। नै तँ कमसँ कम आगुरमे ं िभड़ा नाकोक दुनू पूरामे लगा
ली। जीबछकँ बचनू कहलक- ‘भाय, ताबे तूँ सभ कुछ सिरआबह, हम घरमे िर्शा
रिख दइ िछऐ। काजसँ िनचेन भऽ जाएब।’
जीबछ सभ समान सिरअबए लगल। िर्शाकँ गुरकौने बचनु एकचारीमे
रिख आगनं जा दुनू ब्चो आ पिėयोकँ कहलक- ‘दुनू बािटओ आ दुनू िछपिलयो नेने
चलू।’
किह बचनू आगू बिढ़ गेल। पिėक मन खुशीसँ झुिम उठल। दुनू ब्चा दुनू
बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू िछपली नेने पėी डेिढ़या लग ठाढ़ भऽ मुँहपर नुआ नेने
कनडेिरये आँिखये दुनूकँ देखैत। अपना दुनू गोटेले बचनू चािर-चािर पीस माछ, चािर-
चािर कचड़ी आ अधा िकलो करीब मुरही-घुघनी िमला कऽ रिख, दुनू ब्चाकँ एक-
एक कचड़ी, एक-एक माछक कुिटया आ दू-दू मुŇी मुरही-घुघनी िमला कऽ देलक।
दुनू ब्चा देिख कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी वामा हाथे उठा दिहना हाथे
खाइत िबदा भेल। माए लग पहुँच दुनू ब्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटीमे
घुघनीक िमरचाइक टुकड़ी आ कचड़ीमे सटल िमरचाइकँ देिख माए कहलक- ‘बौआ,
िमरचाइ बीिछ कऽ रिख िदहए। तोरा सभकँ कु लगतौ।’
तिह बीच बचनू गमछाक एक भागमे मुरही-घुघनीकँ िमला, चािर-चािरटा कचड़ी आ
चािर-चािरटा माछक कुिटया फुटा, दुनू गोटेले रखलक। चबु तरे परसँ बचनू घरवालीकँ
सोर पािड़ कहलक- ‘ई सभ लऽ जाउ।’
अदहा मुँह झपने बचनुक पėी सरधा चबुतरापर पहुँच दुनू िछपली बचनुक आगूमे
रिख देलक। एकटा िछपलीमे मु रही कचड़ी आ दोसरमे घुघनी-माछ बचनू दऽ देलक।
झुर माछक तुआ देिख सरधाक मन हँसए लगल। मनमे एलै जे कŎुका जलखै
तकक ओिरयान भऽ गेल। दुनू िछपली तरा-उपरी रिख दुनू हाथसँ पकिड़ आगनं िबदा
भेिल।80 जगदीश Ćसाद मěडल
दुनू गोटे  –जीबछ आ बचनू-  दुनू भाग बैिस बीचमे ताड़ीक डाबा,  िगलास आ
चखना रखलक। दुनू िगलासमे जीबछ ताड़ी ढ़ािर,  आगूमे रिख आँिख मुिन,  ठोर
पटपटबैत मÿं पढ़ए लगल। कनी काल मÿं पिढ़,  आँिख खोिल तीन बेर ताड़ीमे
आगुरं डुबा िन्चँमे झािड़ बाजल- ‘हुअह भाय, आब पीबह।’
छगाएल दुनू, तँ एक लगाइते तीन-तीन िगलास पीिब लेलक। मन शाĠत भेलै।
मन शाĠत होइतिह जीबछ िसगरेट िनकािल एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनुओक
हाथमे देलक। दुनू गोटे िसगरेट धरा पीबए लगल। िसगरेट पीबैत-पीबैत दुनूकँ िनशँ
चढ़ए लगल। िनशँ चिढ़ते गप-सĢप करैक मन दुनू गोटेकँ हुअए लगलै। एक मुŇी
मुरही आ एक टुकड़ी माछ तोिड़ जीबछ मुँहमे लेलक। बचनुओ लेलक। मुँह महक
घंेिट जीबछ बाजल- ‘भाय, तोरा िर्शा चला कऽ पिरवार चिल जाइ छह?’
कचड़ी तोिड़ मु ँहमे लैत बचनू उþर देलक- ‘िकअए ने चलत। हमरा की कोनो
कोठा बनबैक अिछ जे गुजर नै चलत। तहूमे की हम िर्शा बारहो मास थोड़बे
चलबै छी। भिर बरसात चलबै छी। जहँ बरखा बž भेलै आिक महाकाĠत भाइयक
िचमनीमे काज करै छी।’
‘नोकिरयो करै छह?’
‘एहेन नोकरी तँ भगवान सभकँ देथुन।’
अलबेला लोक छिथ महाकाĠत भाय। हुनकर खाली पूँजी टा िछअिन। असली
कारबारी हम दू गोटे छी। सुप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-िबकरीसँ लऽ कऽ
कोइला मगौनाइ ं , ओकर िहसाब बारी केनाइ हुनकर काज िछअिन। आ हमर काज
पथेरीक देखभाल केनाइ,  समएपर ओकरा दमकल चला,  खािधमे पािन देनाइसँ लऽ
कऽ बजारसँ समान कीिन कऽ अननाइ आ िचमनी परसँ घर-परक दौड़-बरहा केनाइ
रहैए।’
‘तब तँ खूब कमाइ होइत हेतह?’
‘कमाइ जँ करए चाही तँ ठीके खू ब हएत। मुदा से नै करै छी। एक सए ुपैया
रोज होइए। ओ घरवालीक हाथमे दऽ दै िछऐ। बाकी खेलॱ-पीलंै। िकएक तँ नजाइज
पाइ जँ घरमे देबै तँ ओइसँ भाभĠस नै हएत।’
दुनू गोटे डबो भिर तािड़ओ आ चखनो खा-पीिब गेल। एक िदिश िनशँसँ दुनूक
देह भिसआइत, दोसर िदस जोरसँ पेशाब लिग गे लै। उठैक मने ने होइ। मुदा पेशाबो
जोेरे होइत जाइत। दुनू गोटे उिठ कऽ पेशाब करै गेल। जाबे पेशाब करै लऽ बैसै
ताबे बुिझ पडै़ जे कपड़ेमे भऽ जाएत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सĦहािर पेशाब करए
बैसल। पेशाब बžे ने होइ। बड़ी कालक बाद पेशाबो बž भेलै आ भĸो खुजलै ।
चबुतरापर दुनू गोटे आिब कऽ बैसल। जीबछ कहलकै- ‘भाय,  हमरा डाĠस
करैक मन होइए।’
जीबछक बात सु िन बचनू पĪथा मािर बैिस, ठेहुनपर दुनू हाथसँ बजबए लगल।
मुदा ओिहसँ अबाज नै िनकलै। अबाज िनकलै मुँहसँ। जिहना-जिहना मुँहसँ बोल
िनकलइ तिहना-तिहना दुनू ठेहुनपर हाथ चलबै। तिह बीच दुनू ब्चो चबुतरापर आिबगामक िजनगी 81
थोपड़ी बजबए लगल। अगनाक ं मुहथिरपर सरधा बैिस देखए लगली। जीबछ डाĠस
करए लगल। थोड़े कालक बाद बचनुक मुँह दुखा गेलै। मुदा जीबछ डाĠस किरते।
दुनू ब्चो थोपड़ी बजिबते। जिहना बािढ़क रेतपर हेलिनहार चीत गरे सु ित कतौसँ
कतौ भिसया कऽ चिल जाइत तिहना बैसल बैसल सरधाक मन भिसआइत। तिह बीच
बचनु उिठ कऽ आगनं गेल। घैलची परक घैलसँ पािन फेिक नेने आएल। उĪटा कऽ
घैल रिख, हाथमे औँठी रहबे करै, दुनू हाथे घैलक पेनपर बजबए लगल। लाजबाब
बाजा। नचैत-बजबैत दुनू गोटे थािक गेल। सुित रहल।
भोर होइते दुनू गोटे उिठ, मुँह-हाथ धोए चिल देलक।
अइ बेर आिसन अपन चािल बदिल लेलक। िकएक तँ आन साल अधहा
आिसनक उपराĠत हिथया नषÿ अबैत छल। से अइ बेर निञ भेलै। पिहने हिथये
चढ़ल। दू िदन हिथया िबतलाक बाद आिसन चढ़ल। ओना बूढ़-बुढ़ानुसक कहब छिन
जे दुगŭपूजामे हिथया पिड़ते अिछ,  मुदा से निञ भेलै। आिसनक इजोिरया पखक
परीबकँ दुगŭ पूजा शुु होइत। अइ बेर अमबिसये िदन हिथया चिल गेल। तिहना
बरखोक भेल। जइ िदन आिसन चढ़ल ओिह िदन घनघनौआ बरखा भेल आ ते कर
बाद फुिहयो ने पड़ल। झँटक कोन गप। हिथयाक लेल ओिरआओल जरनो-काठी आ
अžो-पािन सबहक घरमे रिहये गेल। मुदा तैयो िकसान सबहक मनमे खुशी नै
कमल। िकएक तँ जँ हिथयामे धानक खेतमे ठं गाक हूर गरत तँ धान हेबे करत।
मुदा िकछु गोटेक मनमे शका ं जुर होइ जे िनचला खेतमे ने पािन लगल अिछ मुदा
उपरका खेतक धान कोना फुटत? िकएक तँ उपरका खेतक पािन टघिर कऽ िनचला
खेतमे चिल गेल। िकछु खेतक पािन कँकोड़क बोहिर देने तँ िकछु खेतक पािन
मूसक िबल देने बिह गेल। जिहसँ बरखाक तेसरे िदन उपरका खे त सभ सुिख गे ल।
ओना दसमीक मे लो देिखिनहारक आ मेलामे दोकानो-केिनहारक मनमे खुशी। िकएक तँ
ुख-सुखमे नाचो-तमाशा जमत आ देिखिनहारोक भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक
सभ छगाएल। िकएक तँ जइ िदन सतमी मेला शुु भेल ओिह िदन तेहेन झँट आ
पािन भेल जे मे लाक चुहचुिहये चिल गेलै।
सुखाड़ समए रहने महाकाĠत ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल सोचए लगल। जिहयासँ
िचमनी शुु केलहुँ तिहयासँ एहेन समए निह पकड़ाएल छल। आन साल िदआरीक
पछाित िचमनीक काजमे हाथ लगबै छलहुँ, से अइ बेर भगवान तकलिन। कहुना-
कहुना तँ िदआरी अबैत-अबैत दू खेप भŇा जुर लिग जाएत। सरकारोक योजना
नीक पकड़ाएल। एक िदिश खरĠजाक İकीम तँ दोसर िदिश इिĠदरा आबासक घर।
ततबे निह İकूल आ अİपताल सेहो बनत। ई सभ तँ अपने गामटा मे बनत से निह,
आनो-आन गाममे बनत। सालो भिर ंटाक महगीये रहत। ओते पुराइये ने पाएब। एते
बात मनमे अिबते मुँहसँ हँसी िनकलल। तिह काल पėी रािगनी बेड टी नेने आिब
चुप-चाप िसरमा िदिश ठाढ़ भऽ पितकँ मुİकुराइत देखलिन। पितक मुİकी देिख
रािगनी मने-मन सोचए लागिल जे की बात िछऐ जे ओछाइनेपर पड़ल-पड़ल मुİकरा
रहल छिथ। मुदा िबना िकछु बजनिह टेबुलपर चाह रिख, ओिरया कऽ नाक पकिड़82 जगदीश Ćसाद मěडल
डोला देलक। नाक डोलिबतिह महाकाĠत उिठ कऽ बैिस रहल। आगूमे रािगनीकँ ठाढ़
देिख चौबिžया मुİकी दैत आँिखक इशारासँ पलगपर ं बइसैले रािगनीकँ कहलक।
पितक मूड देिख रािगनी ससिरये जाएब नीक बुझलक।  
महाकाĠत आ रािगनी, सगे ं -सगं कओलेजमे पढ़ने। जिहये दुनू गोटे बी.ए.मे पढ़ैत
छल तिहये दुनूक बीच Ćेम भऽ गेल। दुनू सĦपž पिरवारक। ओना पढ़ैमे दुनू ओते
नीक निह जते दुनूक िरजĪट नीक होए। दुनूकँ मैिƏको आ इĠटरोमे फİट िडिवजन
भेल रहै। तेकर कारण मेहनत निह पैरबी रहए। नीक िरजĪटक दुआरे सिगयो ं -
साथीक बीच आ िशषकोक बीच दुनूक आदर होइ। दुनूक बीच सबं धं बी.ए. आनस्क
्लासमे भेलै। िकएक तँ आनस्मे कम िवńाथŰ रहने गप-सĢप करैक अिधक समए
भेटै। दुनूक बीच सबं धं गप-सपसँ शुु भेल। तेकर बाद िकताबक लाथे डेरोमे एनाइ-
गेनाइ शुु भेल। सबं धं बिढ़ते गेलै। सगे ं बजार बुलनाइ,  िकताब-कापी खरीदनाइसँ
लऽ कऽ कपड़ा, जुþा-चĢपल खरीदनाइ धिर सगे ं हुअए लगलै। िसनेमा तँ मेटिनयो
शोमे देखए लगल। जािहसँ आिगकं सबं धं सेहो शुुह भऽ गेलै। एकटा डबल ुम
लऽ दुनू गोटे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक सबं धकं चरचा िसफ् िवńािथ्ये
आ िशषके धिर निह रिह दुनूक िपता धिर पहुँिच गेलै। मुदा दुनूक िपताक दू िवचार।
तँ बुिझयो कऽ दुनू अनठा देलक। महाकाĠतक िपता सुधीर जुआन-जहानक खेल
बुझैत तँ रािगनीक िपता रमानĠद सĦपž पिरवार आ पढ़ल-िलखल लड़का बुिझ बेटीक
भार उतड़ब बुझैत।
एम.ए. पास केलापर दुनूक िवआह भऽ गेलै। सुधीरक पिरवार एक पुरिखयाह।
अपनो भैयारीमे असकरे आ बेटो तिहना। ओना बेटी चािरटा,  जे सासुर बसैत।
पिरवारक काजसँ महाकाĠतकँ कĦमे सरोकार। तँ भिर-भिर िदन चौखड़ी लगा जु ओ
खेलैत आ शराबो पीबैत। जे िपतो बुझैत। महाजनीक कारोबार, तँ भिर िदन सुधीर
ुपैयेक िहसाब-बारी आ धानेक लेन-देनमे ĭयİत रहैत। महाकाĠतक िƅयाकलाप देिख
एक िदन िखिसया कऽ सुधीर कहलिखन- ‘बौआ, बड़ किठनसँ धन होइ छै। एना जे
भिर-भिर िदन बौआइल घुमै छह, तइसँ कैक िदन लछमी रहतुहुन। तँ िकछु उńम
करह।’
िपताक बात महाकाĠत चुपचाप सुिन लेलक। िकछु बाजल निह। बेटाकँ चुप
देिख फेर कहलिखन- ‘पँच लाख ुपैया दै िछअह,  िचमनी चलाबह। उþरबिरया
बाधमे अपने बीस बीघा ऊँच जमीन छह, ओिहमे िचमनी बना लाए।’
‘बड़बिढ़यँ’ किह महाकाĠतो चुप भऽ गेल। िपताक मनमे जे जखने काजमे लिग
जाएत तखने चािल-ढ़ािल बदिल जेतै। िकएक तँ काज ओहन कारखाना होइत, जिहमे
मनुįय पैदा लैत।
आने साल जेकँ अपन काज बचनू करए लगल। पथेरीक देखभालसँ लऽ कऽ
हाट-बजार आ महाकाĠतक घरपर जा रािगनीकँ ƙाěडीक बोतल पहुँचबै धिर।
महाकाĠतो अपन आने साल जेकँ िनयिमत काज करए लगल। सबेरे आठ बजेमेगामक िजनगी 83
जलखै खा मोटर साइिकलसँ िचमनीपर चिल अबैत। िचमनीपर आिब तीनू गोटे  -
महाकाĠत, सुप, बचनू- भिर मन गँजा पीिब महाकाĠतक िचमनीक कायŭलयमे सुित
रहैत। बारह बजेमे बचनू उठा दैत। उिठतिह महाकाĠत मुनसीसँ ुपैया मंिग बचनुएकँ
ƙाěडी कीनैक लेल बजार पठा दैत आ अपने मुँह-हाथ धोए खाइले घरपर िबदा
होइत। घरपर पहुँिच धड़-फड़ कऽ खाइत आ चोņे घुिर कऽ िचमनीपर आिब सुित
रहैत,  जे चािर बजे उठैत। बचनुओ बजारसँ शराब खरीद महाकाĠतक घरपर जा
रािगनीकँ दऽ दैत। कओलेजे िजनगीसँ दुनू गोटे  -महाकाĠतो आ रािगिनयो-  शराब
पीबैत। ओना रािगनी ƙाěडीये टा पीबैत मुदा महाकाĠत सभ कुछ खाइत-पीबैत। गँजा,
भँग, इ्लीस ं , पोलीिथन, अफीम, ताड़ी सभ कुछ। जखन जे भेटल तखन सएह।
आइ जखन बचनू ƙाěडीक बोतल लऽ रािगनी लग पहुँचल तँ रािगनीक नजिरमे
नव िवचार उपकलै। आन िदन रािगनी बचनूसँ बोतल लऽ रिख लैत। मुदा आइ
आदरसँ बचनूकँ हाथक इशारासँ पलगपर ं बइसैक इशारा केलिन। दुनू गोटे, पलगपर ं
आमने-सामने बैिस गेल।
रािगनी बाजिल- ‘बहुत िदनसँ मनमे छल जे अहँसँ भिर मन गप किरतहुँ। मुदा
अहँ तते धड़फड़ाएल अबै छी जे िकछु कहैक मौके ने भेटैए।’
बचनू- ‘िगरहतनी,  हम तँ मूख् छी। अहँ पढ़ल-िलखल छी। अहँक गĢपक
जबाव हमरा बुते थोड़े देल हएत।
रािगनी- ‘कोनो की हम अहँसँ शाİÿाथ् करब जे जबाव देल निञ होएत। अपन
मनक ĭयथा कहब। जे सभकँ होइ छै।’
मनक ĭयथा सुिन बचनू मने-मन सोचए लगल जे हम सभ गरीब छी,  हरदम
एकटा ने एकटा भूर फूटले रहैए। मुदा रािगनी तँ सभ तरहे सĦपž छिथ। नीक
भोजन, दुनू परानी पढल-िलखल। तखन की मनमे बेथा छिन जे हमरा कहती। मुदा
तैयो मनकँ असिथर कऽ रािगनी िदिश देखए लगल। मनमे उĜसुकता बढै़। मुदा
रािगनीक चेहरामे, डूबैत सूय् जेकँ, मिलनता बढ़ैत।
रािगनी- ‘हमरासँ अहँ बहुत नीक िजनगी जीबै छी।’
अपन Ćशसा ं सुिन बचनू गद-गद भऽ गेल। आँिख चौकžा हुअए लगलै। मनमे
ओहन-ओहन िवचार सेहो उपकए लगलै जेहेन आइ धिर मनमे निह आएल छलै। मुदा
िकछु बाजै निह।
बचनूकँ चौकžा होइत देिख रािगनी कहए लागिल- ‘जिहना अकासमे िचड़ैकँ
उड़ैत देखै िछऐ, तिहना अहूँ छी। मुदा हम िपजरामे बž िचड़ै जे कँ छी। जखन पढ़ै
छलहुँ तखन यएह सोचै छलहुँ जे कोनो कओलेजमे Ćोफेसर बिन िजनगी िबताएब। से
सभ मनेमे रिह गेल। भिर िदन अगनामे ं घेराएल रहै छी। ने ककरोसँ कोनो गप-सĢप
होइए आ ने अगनासँ ं िनकिल कतौ जा सकै छी। तहूमे असकुआ पिरवार अिछ।
लऽ दऽ कऽ एकटा सासु छिथ। ने दोसर िदयादनी आ ने िकयो दोसर। भिर िदन
पलगपर ं पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइए। जाधिर पढ़ै छलहुँ ताधिर दुिनयँ िकछु
आरो बु झाइत छल। मुदा आब िकछु आर बुझाइत अिछ। कखनो मन होइए तँ िकछु84 जगदीश Ćसाद मěडल
पढ़ै छी नै तँ टी.बी. देखै छी। पिढ़ये कऽ की हएत। ने दोसरकँ बुझा सकै छी आ
ने अपना कोनो काज अिछ,  जिह लेल सीखब। जानवरोसँ बþर िजनगी बिन गेल
अिछ। जिहना गाए-महीस भिर पेट खेलक आ खूँटापर बाĠहल रहल तिहना भऽ गेल
छी। मुदा मनु्ख तँ मनुख छी। जाधिर अपना मनक बात दोसरकँ निह कहबै आ
दोसरक पेटक बात निह सुनबै, ताधिर नीक लगत। अनेरे लोक िकअए पढ़ैए। जँ
लकीरक फकीरे बिन जीबैक छैक।
सुखल मुİकी दैत बचनू बाजल- ‘िगरहतनी, अहँकँ कोन चीजक कमी अिछ जे
कोनो तरहक दुख हएत?’
रािगनी- ‘अहँ जे कहलहुँ ओ ठीके कहलॱ। िकएक तँ एहनो बुिझिनहारक
कमी निञ अिछ। एहनो बहुत लोक अिछ जे धनेकँ सभ कुछ बुझैत अिछ। मुदा
धन तँ खाली शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैत अिछ,  मनक तँ निह। तीन सालसँ
बेसी ऐठाम ऐला भऽ गेल मुदा ने एĸोटा िसनेमा देखलहुँ आ ने एĸो िदन कतौ घु मै-
िफरैले गेलहुँ। जाधिर बेटी माए-बाप लग रहैए ताधिर सभ कुछ  -धन-सĦपिþ कुटुĦब-
पिरवार- अपन बुिझ पड़ै छै, मुदा सासुर पाएर दैतिह सभ बीरान भऽ जाइ छै। तिहना
माए-बापक बीच जे आजादी बेटीक रहै छै ओ सासुर ऐलापर एकाएक बž भऽ जाइ
छै।
बचनू- ‘जँ कतौ जाइक मन होइए वा देखैक मन होइए तँ नैहर िकअए ने चिल
जाइ छी?’
रािगनी- ‘जिहना सासुर तिहना नैहरो भऽ गेल। जिहना सासुरमे पुतोहू बिन जीबैत
छी तिहना नैहरोमे पाहुन बिन जाइ छी। जना हĦमर िकछु एिह घरमे अिछये निह। जे
घर अĢपन निञ रहत ओिह घरमे ककरा कहबै जे हम फĪलँ ठीन जाएब। जĠम
देिनहािर माइयो आने बुझैए। तइ परसँ भाए-भौजाइक जुइत। ई तँ निञहरक गप
कहलॱ आ अिहठामक जे होइए से हमहॴ बुझै छी। बुरहा ससुर जखन आगनं औताह
तँ बुिझ पड़त जे जना अİसी मन पािन पड़ल छिन। बूिढ़ सासुसँ तँ कने हँिसयो
कऽ गĢप करताह मुदा हमरा देिखये कऽ झड़कबािह उिठ जाइत छिन। जँ किहयो
माथपर नुआ निह देखलिन तँ बुढ़ीकँ अगुआ कऽ की कहताह की निह, तेकर कोनो
ठेकान निह। भिर-भिर िदन, पहाड़ी झरना जेकँ, आँिखसँ नोर झहरैत रहैए। िकयो
पोछिनहार निह।’
बचनू- ‘िगरहतनी, हमरा बड़ देरी भऽ गेल। महाकाĠत भाय िबगड़ताह।’
रािगनी- ‘अ्छा, चिल जाएब। कहै छलॱ जे सिदखन तरे-तर मन औढ़ं मारैत रहै
अए जे लछमी बाइ जेकँ तलवार उठा परदा-पौसकँ तोिड़ दी, मुदा साहस नै होइए।
केरा भालिर जेकँ करेज डोलए लगैए। आइ जखन अपन मनक बात अहँकँ कहलॱ
तँ मन कने हĪलुक बुिझ पडै़ए।’
बचनू- ‘तखन तँ िगरहतनी हमहॴ नीक छी।’
रािगनी- ‘बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहँसँ गप केलहुँ से जना बुिझ
पड़ैए जे जना पाकल घाबक पीज िनकललापर जे सुआस पड़ै छै तिहना भऽ रहलगामक िजनगी 85
अिछ। आब सभ िदन एक घटा ं गĢप कएल करब। अहँ िकयो आन छी। घरेक
लोक छी की ने ।’
एक टकसँ बचनू रािगनीक आँ िखपर आँिख दऽ हृदए देखए लगल। तिहना
रािगिनयो बचनुक हृदए पढ़ैए लाग

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